Monday, March 31, 2025

४ योग वशिष्ठ चतुर्थ खंड : स्थिति प्रकरण संक्षिप्त ३५- ५१

४ योग वशिष्ठ चतुर्थ  खंड : स्थिति प्रकरण संक्षिप्त (३५-५१ )

अध्याय 35 - वैराग्य और आनंद का वर्णन

इस अध्याय में वसिष्ठ वैराग्य और आनंद के स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जिन्होंने अपने हृदय को अज्ञान से शुद्ध कर लिया है और अपने अनियंत्रित मन पर विजय प्राप्त कर ली है, वे धन्य हैं। आत्म-नियंत्रण ही संसार के दुखों से पार पाने का एकमात्र साधन है।

वसिष्ठ सभी ज्ञान का सार बताते हुए कहते हैं कि भोग की इच्छा बंधन है और उसका त्याग मुक्ति है। सभी सुख विषैले हैं और उनसे विषैले साँपों और आग की तरह दूर रहना चाहिए। इंद्रियों द्वारा अनुभव की जाने वाली हर चीज हानिकारक है। इच्छाओं का मन बुराइयाँ पैदा करता है, जबकि इच्छा रहित मन शांत रहता है। अच्छे गुणों से मन शांत होता है और अज्ञान दूर होता है।

अच्छे लोगों की संगति शांति और मोक्ष प्रदान करती है। तैयार मन इच्छाओं और शत्रुता से मुक्त होता है और दुख-सुख के प्रति उदासीन हो जाता है। वह संदेहों, भ्रमों और त्रुटियों से मुक्त होकर आत्मा के कल्याण की ओर अग्रसर होता है।

वसिष्ठ मन को संसार का कारण बताते हैं और कहते हैं कि जब बुद्धि भ्रमित होती है तो वह मन कहलाती है। आत्मा शरीर नहीं है, बल्कि एक निराकार चेतना है। मन अपनी इच्छाओं के अनुसार रूप लेता है और मनुष्य स्वयं को अपने कर्मों में फँसाता है।

अच्छे कर्म मनुष्य को महान बनाते हैं, जबकि बुरे कर्म नीचा दिखाते हैं। शुद्ध मन हमेशा अच्छे फल देता है। संसार एक भ्रम है और केवल ब्रह्म ही सत्य है। अहंकार बंधन का कारण है, जबकि अनंतता का ज्ञान मुक्ति का मार्ग है।

वसिष्ठ राम को अपनी आत्मा को सभी के समान मानने और सभी इच्छाओं से दूर रहने का उपदेश देते हैं। शास्त्रों के ज्ञान से शुद्ध मन ब्रह्म का प्रतिबिंब प्राप्त करता है। संसार की वास्तविकता को भूलकर ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करने से परम का दर्शन होता है।

अंत में, वसिष्ठ राम को संसार की व्यर्थताओं से दूर रहने, शाश्वत आत्मा पर भरोसा करने और मन की चंचलता को नियंत्रित करने की सलाह देते हैं। इच्छाओं के समाप्त होने और मन शांत होने पर, अज्ञान का अंधकार दूर हो जाता है और आत्मा का प्रकाश चमकता है, जिससे परम आनंद की प्राप्ति होती है। शुद्ध मन सार्वभौमिक कल्याण की ओर मुड़ता है और अपने शरीर पर स्वामी की तरह शासन करता है। ज्ञानी पुरुष संसार के दुखों को करुणा की दृष्टि से देखते हुए शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं।

राम का प्रश्न:

  • राम वसिष्ठ से वैराग्य और परम आनंद के स्वरूप के विषय में पूछते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: वैराग्य का अर्थ:

  • वैराग्य का अर्थ है सांसारिक वस्तुओं, भोगों और आसक्तियों से पूर्ण विरक्ति।

  • यह इच्छाओं का त्याग और अनासक्ति का भाव है।

  • यह बाहरी वस्तुओं से मन को हटाकर आंतरिक शांति में स्थित होना है।

वैराग्य की आवश्यकता:

  • सांसारिक सुख क्षणिक और दुखदायी होते हैं।

  • सच्चा और स्थायी आनंद वैराग्य के बिना प्राप्त नहीं हो सकता।

  • वैराग्य मन को शुद्ध करता है और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।

आनंद का स्वरूप:

  • परम आनंद आत्मा का स्वाभाविक गुण है।

  • यह विषय भोगों से प्राप्त होने वाले क्षणिक सुखों से भिन्न, स्थायी और असीम होता है।

  • यह दुख और अशांति से रहित होता है।

  • यह आत्मज्ञान और ब्रह्म के साक्षात्कार से प्राप्त होता है।

वैराग्य और आनंद का संबंध:

  • वैराग्य आनंद की प्राप्ति का मार्ग है।

  • जब मन सांसारिक आसक्तियों से मुक्त होता है, तो वह स्वाभाविक रूप से आनंद की ओर अग्रसर होता है।

  • वैराग्य के बिना आनंद की कल्पना करना असंभव है।

वैराग्य प्राप्त करने के उपाय:

  • सांसारिक वस्तुओं की क्षणभंगुरता और दुखमय प्रकृति का चिंतन करना।

  • आत्मज्ञान और सत्य की खोज में लगना।

  • मन को नियंत्रित करना और इच्छाओं का त्याग करना।

  • सत्संग और आध्यात्मिक अभ्यास करना।

वैराग्य की अवस्था:

  • वैरागी व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं में आसक्ति नहीं रखता।

  • वह सुख-दुख, लाभ-हानि में समभाव रखता है।

  • उसका मन शांत और स्थिर होता है।

  • वह परम आनंद में स्थित रहता है।

आनंद की अनुभूति:

  • आनंद की अनुभूति शब्दों से परे है, इसे केवल अनुभव किया जा सकता है।

  • यह मन की सभी वृत्तियों के शांत होने पर आत्मा में स्थित होने से प्राप्त होती है।

निष्कर्ष:

  • वैराग्य सांसारिक दुखों से मुक्ति और परम आनंद की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है।

  • इच्छाओं का त्याग और अनासक्ति ही सच्चे आनंद की ओर ले जाते हैं।

अध्याय 36 - बुद्धि की सृष्टि का वर्णन

राम का प्रश्न:

  • राम वसिष्ठ से बुद्धि की सृष्टि के विषय में पूछते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: सृष्टि का क्रम:

  • वसिष्ठ बताते हैं कि सृष्टि का आरंभ ब्रह्म से होता है।

  • ब्रह्म से चित्त (चेतना) उत्पन्न होता है।

  • चित्त से अहंकार का प्रादुर्भाव होता है।

  • अहंकार से मन की उत्पत्ति होती है।

  • मन से बुद्धि का विकास होता है।

बुद्धि का स्वरूप:

  • बुद्धि निर्णय लेने, विश्लेषण करने और ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता है।

  • यह मन से सूक्ष्म और अधिक परिष्कृत है।

  • यह सत्य और असत्य, उचित और अनुचित का विवेक करती है।

बुद्धि की उत्पत्ति का कारण:

  • बुद्धि की उत्पत्ति मन की इच्छाओं और संकल्पों के कारण होती है।

  • जब मन किसी वस्तु या विचार पर स्थिर होता है, तो बुद्धि उसका विश्लेषण करती है।

बुद्धि के कार्य:

  • बुद्धि ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करती है।

  • यह मन के विचारों को व्यवस्थित करती है।

  • यह निर्णय लेने में सहायता करती है।

  • यह सत्य और असत्य के बीच भेद करती है।

बुद्धि के प्रकार (संभवतः निहित):

  • सात्विक बुद्धि (सत्य और धर्म का ज्ञान कराने वाली)।

  • राजसिक बुद्धि (कर्म और फल में आसक्ति कराने वाली)।

  • तामसिक बुद्धि (अज्ञान और भ्रम में डालने वाली)।

बुद्धि का महत्व:

  • बुद्धि मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती है।

  • यह ज्ञान और मुक्ति प्राप्त करने का साधन है।

बुद्धि का नियंत्रण:

  • बुद्धि को नियंत्रित करके मन को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

  • विवेकपूर्ण बुद्धि सुख और शांति की ओर ले जाती है।

अज्ञान और बुद्धि:

  • अज्ञान के कारण बुद्धि भ्रमित हो जाती है और गलत निर्णय लेती है।

  • ज्ञान के प्रकाश से बुद्धि सत्य का विवेक कर पाती है।

निष्कर्ष:

  • बुद्धि मन से उत्पन्न होती है और ज्ञान प्राप्त करने, निर्णय लेने और सत्य का विवेक करने की महत्वपूर्ण क्षमता है।

  • बुद्धि का उचित उपयोग मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाता है।


1. चौदह लोक (चतुर्दश भुवन):

भारतीय दर्शन और पुराणों में ब्रह्मांड को विभिन्न स्तरों या लोकों में विभाजित किया गया है। ये लोक ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) और अधो (नीचे की ओर) क्रम में व्यवस्थित माने जाते हैं। आमतौर पर माने जाने वाले चौदह लोक इस प्रकार हैं:

  • ऊर्ध्व लोक (सात):

    1. भूलोक: यह पृथ्वी लोक है, जहाँ मनुष्य और अन्य स्थलीय प्राणी रहते हैं।

    2. भुवर्लोक: यह पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का अंतरिक्षीय क्षेत्र है, जहाँ सिद्ध, गंधर्व आदि वास करते हैं।

    3. स्वर्गलोक (या स्वर्लोक): यह देवताओं और पुण्यात्माओं का निवास स्थान है, जहाँ सुख और आनंद की प्राप्ति होती है।

    4. महर्लोक: यह तपस्वियों और महान ऋषियों का लोक है, जो प्रलय के समय भी सुरक्षित रहता है।

    5. जनलोक: यह ब्रह्मा के मानस पुत्रों और विरक्त आत्माओं का लोक है।

    6. तपोलोक: यह अत्यंत वैरागी और तपस्वी आत्माओं का लोक है।

    7. सत्यलोक (या ब्रह्मलोक): यह ब्रह्मा जी का निवास स्थान है और सृष्टि का सर्वोच्च लोक माना जाता है।

  • अधो लोक (सात):

    1. अतल लोक: यह मायावी शक्तियों वाले प्राणियों का लोक है।

    2. वितल लोक: यहाँ हाटकेश्वर शिव का निवास माना जाता है।

    3. सुतल लोक: यह दानवराज बलि का लोक है, जो विष्णु की कृपा से यहाँ निवास करते हैं।

    4. तलातल लोक: यह नागों और असुरों का लोक है।

    5. महातल लोक: यहाँ भी नाग और अन्य शक्तिशाली प्राणी रहते हैं।

    6. रसातल लोक: यह दानवों और दैत्यों का लोक है, जो पृथ्वी को धारण करते हैं।

    7. पाताल लोक: यह नागलोक है, जहाँ शेषनाग का निवास माना जाता है।

यह वर्गीकरण ब्रह्मांड की जटिलता और विभिन्न प्रकार की चेतनाओं के स्तरों को दर्शाता है।

शीर्षक: कर्म में अकर्म; अकर्ता आत्मा

मुख्य बिंदु:

  • राम का प्रश्न:

    • राम पूछते हैं कि कर्म करते हुए भी अकर्म कैसे हो सकता है, और कर्ता होते हुए भी अकर्ता कैसे रहा जा सकता है।

  • वसिष्ठ का उत्तर: ज्ञान का महत्व:

    • यह ज्ञान के द्वारा ही संभव है कि कर्म करते हुए भी अकर्म और कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहा जा सके।

  • आत्मा का वास्तविक स्वरूप:

    • आत्मा निष्क्रिय, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है।

    • यह न तो कुछ करती है और न ही किसी क्रिया का फल भोगती है।

  • मन और बुद्धि की भूमिका:

    • मन और बुद्धि ही कर्मों को करते हैं और उनके फल भोगते हैं।

    • अज्ञान के कारण आत्मा को कर्ता और भोक्ता मान लिया जाता है।

  • कर्म में अकर्म:

    • जब कोई व्यक्ति यह जानता है कि आत्मा वास्तव में अकर्ता है और सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा मन और बुद्धि के माध्यम से हो रहे हैं, तो वह कर्म करते हुए भी अकर्म रहता है।

    • उसका कर्मों में आसक्ति नहीं होती।

  • कर्ता में अकर्ता:

    • जब कोई व्यक्ति अहंकार और कर्तापन के भाव से मुक्त होकर कर्म करता है, तो वह कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहता है।

    • वह कर्मों के फल की इच्छा नहीं रखता।

  • उदाहरण:

    • जैसे आकाश सभी क्रियाओं का साक्षी है लेकिन स्वयं कुछ नहीं करता, वैसे ही आत्मा भी सभी कर्मों की साक्षी है लेकिन स्वयं अकर्ता है।

  • ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग:

    • शास्त्रों का अध्ययन, गुरु का मार्गदर्शन और निरंतर अभ्यास के द्वारा इस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है।

  • अज्ञान का बंधन:

    • अज्ञान के कारण ही आत्मा स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानकर बंधनों में जकड़ी रहती है।

  • मुक्ति का मार्ग:

    • ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है।

    • जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेती है, तो वह कर्मों के बंधनों से मुक्त हो जाती है।

  • समता का भाव:

    • ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समभाव रखता है।

    • वह कर्मों के फल से अप्रभावित रहता है।

  • मन का नियंत्रण:

    • मन को नियंत्रित करके और आसक्ति को त्यागकर अकर्मता और अकर्तापन की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

  • कर्मयोग:

    • फल की इच्छा किए बिना कर्तव्य कर्म करना ही कर्मयोग है।

    • यह अकर्मता और अकर्तापन की ओर ले जाता है।

  • निष्कर्ष:

    • ज्ञान के द्वारा आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानकर कर्म करते हुए भी अकर्म और कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहा जा सकता है।

    • यही मुक्ति का मार्ग है।


अध्याय 37 - उपशम: आत्मा की स्थिरता; मन की आभासी गतिविधि

राम का प्रश्न:

  • राम पूछते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति, जो संसार की क्षणभंगुरता को जानता है, फिर भी सांसारिक कार्यों में क्यों संलग्न रहता है।

वसिष्ठ का उत्तर: बुद्धिमानों का दृष्टिकोण:

  • बुद्धिमान व्यक्ति संसार को स्वप्नवत और क्षणिक जानता है।

  • वे कर्म करते हुए भी अनासक्त रहते हैं, जैसे स्वप्न में किए गए कार्यों का कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होता।

मन की चंचलता और अज्ञान:

  • मन स्वभाव से चंचल है और अज्ञान के कारण सांसारिक वस्तुओं में आसक्त होता है।

  • अज्ञानी व्यक्ति सत्य को नहीं जानता और इसलिए दुखों से घिरा रहता है।

ज्ञानी का मन:

  • ज्ञानी का मन वासनाओं से मुक्त होता है और शांत रहता है।

  • वे कर्म करते हुए भी कर्तापन के भाव से मुक्त रहते हैं।

आत्मा की स्थिरता:

  • आत्मा अपरिवर्तनीय और स्थिर है।

  • मन की चंचलता आत्मा को प्रभावित नहीं करती, जैसे हवा बादलों को हिलाती है लेकिन आकाश को नहीं।

कर्म और कर्ता का भ्रम:

  • अज्ञानी व्यक्ति मन को आत्मा समझकर कर्तापन का भ्रम पालता है।

  • ज्ञानी जानता है कि कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, आत्मा निष्क्रिय साक्षी है।

बंधन का कारण:

  • मन की आसक्ति और कर्तापन का भाव ही बंधन का कारण है।

  • ज्ञानी इन बंधनों से मुक्त रहता है।

ज्ञान का महत्व:

  • आत्मज्ञान से मन की चंचलता समाप्त होती है और आत्मा की स्थिरता का अनुभव होता है।

  • ज्ञानी सुख-दुख में समान भाव रखता है।

संसार की तुलना:

  • संसार एक जादू या भ्रम के समान है, जिसकी वास्तविकता क्षणिक है।

  • बुद्धिमान व्यक्ति इस भ्रम को जानता है और इसलिए इससे प्रभावित नहीं होता।

कर्म करने का तरीका:

  • ज्ञानी अनासक्त भाव से लोक कल्याण के लिए कर्म करते हैं।

  • उनके कर्म बंधन का कारण नहीं बनते।

मन का निग्रह:

  • मन को नियंत्रित करके और आसक्ति को त्यागकर आत्मा की स्थिरता को प्राप्त किया जा सकता है।

ज्ञानी की मुक्ति:

  • ज्ञानी इस जीवन में ही मुक्त रहता है (जीवन्मुक्त)।

  • मृत्यु के बाद वह परम ब्रह्म में विलीन हो जाता है।

अज्ञानी की स्थिति:

  • अज्ञानी मन की चंचलता के कारण दुखों में फंसा रहता है और पुनर्जन्म के चक्र में घूमता रहता है।

निष्कर्ष:

  • बुद्धिमान व्यक्ति संसार को जानते हुए भी अनासक्त भाव से कर्म करते हैं, क्योंकि वे आत्मा की स्थिरता और मन की चंचलता के भेद को समझते हैं।

अध्याय 38 - आत्मा की वही स्थिरता; मन कर्ता के रूप में

बुद्धिमानों की स्थिति:

  • बुद्धिमानों के कार्य, अच्छे या बुरे, सुखद या दुखद, वास्तव में असत्य और अप्रभावी होते हैं।

  • ये मानसिक और स्वैच्छिक ऊर्जाओं का प्रयोग मात्र हैं।

कर्म की परिभाषा:

  • कर्म उचित साधनों का प्रयोग, शारीरिक प्रयास और मंशा के अनुरूप परिणाम की पूर्ति है।

कर्ता का निर्धारण:

  • अज्ञानी अपनी इच्छाओं से कर्ता बनते हैं।

  • बुद्धिमान इच्छा रहित होने के कारण अनैच्छिक कार्यों के लिए दोषी नहीं होते।

ज्ञान प्राप्ति का प्रभाव:

  • जिसने सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वह सांसारिक इच्छाओं में शिथिल हो जाता है।

  • वह शांत मन से कर्म करता है और सफलता को ईश्वर की इच्छा मानता है।

मन की प्रधानता:

  • मन जो इरादा करता है, वही होता है।

  • कर्ता मन है, शरीर नहीं।

संसार की उत्पत्ति:

  • संसार दिव्य मन से उत्पन्न होता है और उसमें स्थित है।

ज्ञानी का वैराग्य:

  • आत्मा को जानने वाले अपनी इच्छाओं से पूर्ण वैराग्य प्राप्त करते हैं।

  • वे परम आनंद में विश्राम करते हैं।

सुख और दुख की कल्पना:

  • मन ही सुख और दुख की कल्पना करता है, न कि शारीरिक क्रिया या निष्क्रियता।

  • जब मन किसी अन्य विचार में लीन होता है, तो कर्म का अनुभव नहीं होता।

अमूर्त ध्यान का महत्व:

  • जो अपने मन के अमूर्त ध्यान में सब कुछ देखता है, वह स्वयं में सब कुछ देखता है।

  • वह सुख-दुख से अगम्य हो जाता है।

आत्मज्ञान का फल:

  • जो स्वयं को जानता है, वह विपत्ति में भी आनंदित रहता है।

मन ही कर्ता है:

  • मन ही कार्यों का कर्ता है, आत्मा नहीं।

ज्ञानी का दृष्टिकोण:

  • बुद्धिमान अपने कार्यों का श्रेय स्वयं को नहीं देते।

  • वे फल की अपेक्षा नहीं करते।

मन का नियंत्रण:

  • अनियंत्रित मन ही सभी प्रयासों, कर्मों और उनके परिणामों का मूल है।

  • मन को दूर करके सभी दुखों से बचा जा सकता है।

सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता:

  • सांसारिक सुख क्षणिक हैं।

आत्मा का वास्तविक स्वरूप:

  • केवल आत्मा ही वास्तविक है।

  • आत्मा न तो सक्रिय है और न ही निष्क्रिय कर्ता।

मुक्ति की अवस्था:

  • सांसारिक मन वालों के लिए मुक्ति नहीं है।

  • योगी जीवन्मुक्त अवस्था में मुक्ति का अनुभव करते हैं।

ज्ञानी की स्थिति:

  • ज्ञानी एकता और द्वैत के भेद को जानते हुए भी बंधन और स्वतंत्रता से परे होते हैं।

सच्चे अहंकार पर स्थिरता:

  • मन को सांसारिक बंधनों से मुक्त करके सच्चे अहंकार पर स्थिर रहना चाहिए।

अध्याय 39 - वसिष्ठ ने पवित्रता से अशुद्धता के प्रश्न को टाला; सभी चीजों की एकता

राम का प्रश्न:

  • राम परम ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में पूछते हैं, जिसे वसिष्ठ शून्यता के कैनवास पर स्थिर चित्र की तरह बताते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: ब्रह्म का स्वभाव:

  • ब्रह्म का ऐसा स्वभाव है कि उससे सभी शक्ति लगातार प्रवाहित होती है।

  • सभी शक्तियाँ उसमें निवास करती हैं।

  • उसमें सत्ता, गैर-सत्ता, एकता, द्वैत और बहुलता है।

  • वह सभी चीजों का आरंभ और अंत है।

  • वह एक है, जैसे समुद्र जिसके पानी में अनगिनत आकार हैं।

  • चेतना घनी होकर मन बनाती है, और मन सोचने, इच्छा करने और कार्य करने की शक्तियाँ उत्पन्न करता है।

  • ब्रह्म सभी जीवित प्राणियों और दृश्यमान जगत का स्रोत है।

  • उसकी शक्ति सभी चीजों को उनके निरंतर मार्ग या स्थिरता में प्रदर्शित करती है।

  • सभी चीजें परम आत्मा से उत्पन्न होती हैं और उसके सर्वव्यापी मन में निवास करती हैं।

  • वे अपने स्रोत के समान स्वभाव के हैं।

राम का हस्तक्षेप और संदेह:

  • राम वसिष्ठ के प्रवचन को अस्पष्ट बताते हैं और उनके कहने का अर्थ समझने में असमर्थता व्यक्त करते हैं।

  • वे ब्रह्म के मन और इंद्रियों से परे होने और उससे उत्पन्न नाशवान चीजों के बारे में विरोधाभास उठाते हैं।

  • वे उत्पादन के नियम (उत्पन्न वस्तु उत्पादक के समान स्वभाव की होती है) का उल्लेख करते हैं।

  • वे ब्रह्म की शुद्धता और सृष्टि की अशुद्धता का प्रश्न उठाते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: ब्रह्म की पवित्रता और सृष्टि की प्रकृति:

  • ब्रह्म पूर्ण पवित्रता है, उसमें कोई अशुद्धता नहीं है।

  • तुलना: समुद्र की सतह पर गंदी लहरें गहरे पानी को दूषित नहीं करतीं।

  • ब्रह्म के अतिरिक्त किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु की कल्पना नहीं की जा सकती।

  • तुलना: गर्मी के अतिरिक्त आग की कल्पना नहीं की जा सकती।

राम का पुनः संदेह:

  • राम ब्रह्म के दुख से रहित होने और संसार के दुखों से भरे होने का विरोधाभास उठाते हैं।

  • वे सृष्टि को ब्रह्म का वंशज कहने पर स्पष्ट समझ की कमी व्यक्त करते हैं।

वाल्मीकि का कथन: वसिष्ठ का मौन और चिंतन:

  • राम के वचनों पर वसिष्ठ मौन हो जाते हैं और चिंतन करते हैं।

  • उनका मन अपनी अभ्यस्त स्पष्टता खो देता है, फिर पुनः प्राप्त करता है।

  • वे शिक्षित और बुद्धिमान मन (जैसे राम) द्वारा मुक्ति के विषय के अंत तक पहुंचने पर विचार करते हैं।

  • वे अर्ध-शिक्षितों को आध्यात्मिक उपदेश देने की अनुपयुक्तता पर विचार करते हैं।

  • वे ज्ञानी व्यक्ति की ब्रह्म को सब में सब कुछ देखने की क्षमता पर विचार करते हैं।

  • वे शिष्य को तैयार करने और शुद्ध करने की प्रक्रिया (स्थिरता, आत्म-नियंत्रण) पर विचार करते हैं।

  • वे "सब ब्रह्म है" के विश्वास को आधे-अधूरे शिक्षितों को सिखाने के खतरे पर विचार करते हैं।

  • वे प्रबुद्ध, इच्छा रहित और अज्ञान से मुक्त शिष्यों को ही आध्यात्मिक उपदेश देने के महत्व पर जोर देते हैं।

  • वे अयोग्य शिष्य को उपदेश देने वाले गुरु के परिणाम पर विचार करते हैं।

वसिष्ठ का पुनः कथन: अशुद्धता के प्रश्न का स्थगन और ब्रह्म की सर्वव्यापकता:

  • वसिष्ठ राम को बताते हैं कि वे व्याख्यान के अंत में अशुद्धता के प्रश्न का उत्तर देंगे।

  • वे ब्रह्म को सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और स्वयं सब कुछ बताते हैं।

  • अपनी सर्वशक्तिमत्ता से वह सब कुछ कर सकता है और बन सकता है।

  • तुलना: जादूगरों और बाजीगरों के अवास्तविक प्रदर्शन।

  • संसार ब्रह्म से उत्पन्न होता है, उसमें स्थित है और उसमें विलीन हो जाता है।

  • संसार परियों की कहानियों के उद्यानों और गंधर्वों के हवाई किलों की तरह है।

  • जो कुछ भी है, रहा है या होने वाला है, वह सब घूमते हुए आकाश और खगोलीय पिंडों के प्रतिबिंबों की तरह है।

  • ये सब स्वयं ईश्वर की अभिव्यक्तियों के विभिन्न रूप हैं।

एक स्व-अस्तित्व वाली वास्तविकता:

  • किसी भी समय, किसी भी स्थान पर और किसी भी रूप में जो कुछ भी होता है, वह एक ही स्व-अस्तित्व वाली वास्तविकता की विविधता है।

  • राम को दुख, आनंद या आश्चर्य व्यक्त न करने की सलाह।

परिवर्तन के बीच मन की समानता:

  • बुद्धिमानों को सभी परिवर्तनों के बीच अपने मन और स्वभाव की समानता बनाए रखनी चाहिए।

  • जो ईश्वर को सब में देखता है और समता से भरा है, उसे आश्चर्य, शोक या आनंद का कोई कारण नहीं है।

ईश्वर की शक्ति की विविधता:

  • अपरिवर्तित मन सभी बाहरी परिस्थितियों में अपने निर्माता की शक्ति की विविधताओं को देखता रहता है।

  • प्रभु अपनी सृष्टि के निर्माण में योजनाएँ बनाते हैं।

  • तुलना: समुद्र की लहरें, दूध से मक्खन, पृथ्वी से बर्तन, धागे से कपड़ा, अंजीर के फल।

  • रूप में परिवर्तन वास्तविक नहीं, बल्कि मात्र दिखावे हैं।

  • कोई कर्ता, कर्म या वस्तु नहीं है, केवल एक एकता की विविधता है।

आध्यात्मिक सत्य और मन की शांति:

  • आध्यात्मिक सत्यों का साक्षी मन स्वयं सत्य के प्रकाश को देखता है।

  • तुलना: दीपक और प्रकाश, सूर्य और दिन, फूल और सुगंध, जीव आत्मा और संसार का ज्ञान।

  • संसार आत्मा के प्रकाश की तरह है, हवा की गति की तरह जिसकी वास्तविकता अज्ञात है।

आत्मा और स्थूल शरीर:

  • निष्कलंक आत्मा स्थूल शरीरों के प्रकट होने और गायब होने की प्रमुख शक्ति है।

  • तुलना: घूमते तारे, मौसमी फूल, पहियों के उतार-चढ़ाव।

  • आत्मा के बिना सब कुछ मिट जाता है, आत्मा की उपस्थिति में सब कुछ प्रकट होता है।

  • सब कुछ आत्मा के साथ पैदा होता है और उसके खोने के साथ खो जाता है।

मन और ज्ञान:

  • मनुष्य जन्म से ही ज्ञान से संपन्न होते हैं।

  • समय के साथ मन संसार के रूप में विस्तारित होता है।

सांसारिक अस्तित्व का वृक्ष:

  • संसार के वन आत्मा के बंधन का स्थान हैं जहाँ इच्छाएँ दुख उत्पन्न करती हैं।

  • राम को भेद की तलवार से सांसारिक अस्तित्व के वृक्ष को काटने की सलाह।

अध्याय 40 - संसार की ब्रह्म के साथ पहचान; शब्दों का प्रयोग

राम का प्रश्न:

  • राम ब्रह्म से पशु प्राणियों की उत्पत्ति और उनके विभिन्न नामों व स्वभावों को विस्तार से जानने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: सृष्टि प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण:

  • ब्रह्म से विभिन्न प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति का तरीका।

  • उनका विनाश और अंत में मुक्ति कैसे प्राप्त करते हैं।

  • संसार में उनके विकास, पोषण और उपयुक्तता का वर्णन संक्षेप में।

चेतना और मन का प्रादुर्भाव:

  • ब्रह्म की सर्वशक्तिमान चेतना (चित-शक्ति) विचारित रूप (चेत्य) बन जाती है।

  • चेतना का संघनन सूक्ष्म रूप (मन) बनता है, जिसमें विचार शक्ति होती है।

  • मन इच्छाशक्ति से अवास्तविक (आदर्श) दृश्य (परियों की भूमि) का विस्तार करता है, ब्रह्म की विचारहीनता से अलग होकर।

चेतना का विभिन्न रूपों में प्रकटीकरण:

  • मूल अवस्था में चेतना निर्वात या आकाश लगती है।

  • मन के रूप में प्रकट होने पर दृश्यमान आकाश लगती है।

  • ब्रह्मा (कमल-जन्मा) की अवधारणा और प्रजापति के रूप में सृष्टि का विचार।

सृष्टि की संरचना:

  • ब्रह्मा के मन से चौदह लोकों की सृष्टि, जिनमें असंख्य और विभिन्न प्रकार के जीव हैं।

  • मन स्वयं खाली शरीर के साथ शून्यता है।

  • विचार मन की क्रिया का क्षेत्र है, जो मन के झूठे कार्यों से भरा है।

प्राणियों की विविधता:

  • ब्रह्मा के मन में अज्ञानी पशुओं से लेकर प्रबुद्ध ऋषियों तक विभिन्न प्रकार के प्राणी हैं।

  • भारत में रहने वाली मानव जाति शिक्षा और सभ्यता प्राप्त करने में सक्षम है।

  • अधिकांश रोग, दुख, अज्ञानता, शत्रुता और भय से पीड़ित हैं।

वसिष्ठ के प्रवचन का उद्देश्य:

  • सामाजिक और साधु आचरण पर व्याख्यान देना।

  • शाश्वत, अविनाशी, सर्वव्यापी ब्रह्म का वर्णन करना।

  • ब्रह्म की स्थिर देह के एक कण की गति से अनंत प्राणियों की गति का स्पष्टीकरण।

राम का प्रश्न: अनंत में भाग और स्थिर में गति कैसे?

  • राम अनंत आत्मा के भाग, स्थिर ईश्वर की गति, या उनमें परिवर्तन या प्रयास पर प्रश्न उठाते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग:

  • शास्त्रों और सामान्य भाषा में "यह सब उससे बना है" कहना प्रचलित है, लेकिन यह वास्तविक अर्थ में ऐसा नहीं है।

  • अपरिवर्तनीय ब्रह्म से कोई परिवर्तन, विभाजन, स्थान या समय का संबंध नहीं है।

  • अगम्य का प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों से संभव है।

  • सामान्य बोलचाल के शब्दों का उपयोग।

प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों के प्रकार:

  • "उससे उत्पन्न" (तज्ज) - उदाहरण: "अग्नि से अग्नि उत्पन्न होती है" (सांसारिक ब्रह्मा आध्यात्मिक ब्रह्मा से)।

  • "उसी का परिवर्तन" (तन्मय) - उदाहरण: "ब्रह्मा उत्पादक और उत्पादित है" (निर्माता और सृष्टि की पहचान)।

एकता का सिद्धांत:

  • "यह एक चीज है और वह दूसरी" (इदम्-अन्यत्) कहना झूठा है, यह अंतर केवल शाब्दिक है, वास्तविक नहीं।

  • ईश्वर की प्रकृति एक और सब कुछ है।

मन की शक्ति:

  • ब्रह्मा से जन्म (तज्ज) के कारण मन में उनकी चेतना की शक्ति और बुद्धि होती है।

  • तीव्र अनुप्रयोग से इच्छित उद्देश्य पूरा करने में सक्षम।

झूठे तर्क का खंडन:

  • एक लौ दूसरी को उत्पन्न करती है, यह मात्र शब्दों का विवाद है।

  • एक ब्रह्मा, अनंत होने के कारण, स्वयं को पुन: उत्पन्न करने के अलावा कुछ और उत्पन्न नहीं कर सकता।

  • झूठे तर्क से विरोधी को हराना सही नहीं है।

ब्रह्म और सृष्टि का संबंध:

  • विद्वान ब्रह्म को अंतहीन लहरों वाले समुद्र के रूप में जानते हैं।

  • सार्थक शब्द और उनके अर्थ ब्रह्म और उसकी सृष्टि की तरह जुड़े हैं।

ब्रह्म का स्वरूप:

  • ब्रह्म चेतना, मन, बुद्धि और पदार्थ है।

  • वह ध्वनि, समझ और चीजों के सिद्धांतों में है।

  • पूरा ब्रह्मांड ब्रह्म है और फिर भी वह इन सब से परे है।

अज्ञानता के विरोधाभासी कथन:

  • "यह एक चीज है और वह दूसरी है," "यह महान आत्मा का एक हिस्सा है," ये सब अज्ञान के विरोधाभासी कथन हैं।

  • अज्ञात के सच्चे स्वभाव को शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता।

आत्मा और मन की तुलना:

  • आत्मा अग्नि की लौ की तरह उठती है, और यह लौ मन का प्रतीक है।

  • मन का कंपन वास्तविक नहीं है, दिव्य मन में कोई उदय या पतन नहीं है।

असत्य का स्वरूप:

  • असत्य डगमगाता है और दोहरे अर्थों में अस्पष्ट होता है।

  • यह सत्य से विचलित होता है, जैसे दोषपूर्ण आँख दो चंद्रमा देखती है।

ब्रह्म की अनन्यता:

  • ब्रह्म स्वयं सब कुछ है, सर्वव्यापी और अपने स्वभाव से अनंत है।

  • उसके अलावा कोई और चीज नहीं हो सकती, और उससे उत्पन्न कुछ भी स्वयं वही है।

शास्त्रों का सत्य:

  • ब्रह्म के अस्तित्व के सत्य के अलावा कुछ भी निश्चित रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता।

  • शास्त्र कहते हैं, "वास्तव में, यह सब ब्रह्म है।"

निष्कर्ष और भविष्य की शिक्षा:

  • यही निष्कर्ष तर्क से प्राप्त होगा, जिसे निर्वाण की पुस्तक में समझाया जाएगा।

  • यह एक प्रश्न कई अज्ञात बातें उठाता है, जो भविष्य में ज्ञात होंगी।

वास्तविकता का प्रकटीकरण:

  • अवास्तविकता के गायब होने पर वास्तविकता दिखाई देती है।

  • तुलना: रात का अंधेरा दूर होने पर संसार का दिखना।

शांत स्थिरता की प्राप्ति:

  • झूठी दृष्टि को दिखने वाला विशाल संसार शांत स्थिरता की अवस्था में गायब हो जाएगा।

  • सत्य का प्रकाश उदय होने पर झूठे दिखावे दूर हो जाएंगे।


अध्याय 41 - शब्दों का प्रयोग; अज्ञान का वर्णन

राम की प्रशंसा और प्रश्न:

  • राम वसिष्ठ की वाणी को क्षीरसागर के जल के समान शीतल और चमकीली बताते हैं।

  • वे ब्रह्म को अनंत और अकल्पनीय मानते हैं।

  • वे पूछते हैं कि लोग ब्रह्म में उनकी प्रकृति से भिन्न गुण कैसे आरोपित करते हैं।

वसिष्ठ का उत्तर: शब्दों का उचित प्रयोग:

  • वसिष्ठ कहते हैं कि उनके व्याख्यानों के शब्द और अर्थ सही और साधारण अर्थों में प्रयुक्त होते हैं।

  • वे महत्वहीन, अर्थहीन, संदिग्ध, अस्पष्ट या विरोधाभासी नहीं हैं।

  • समझ स्पष्ट होने पर शब्दावली का उचित महत्व समझ आएगा।

  • अपनी साधारण समझ से वचनों की व्याख्या न करने की सलाह।

सार्थक शब्दों का महत्व:

  • ब्रह्म के सत्य को जानने पर सार्थक शब्दों के भेद ज्ञात होंगे।

  • विशिष्ट मौखिक संकेत विचारों को संप्रेषित करने और शास्त्रों के अभिप्राय को जानने के लिए हैं।

  • शब्द और उनके अर्थ अज्ञानियों के लिए हैं, सत्य जानने वालों के लिए नहीं।

आत्मा का स्वरूप:

  • मुक्त और निष्कलंक आत्मा से कोई गुण या आरोपण संबंधित नहीं है।

  • यह परम ब्रह्म की निष्पक्ष भावना है और विद्यमान संसार की आत्मा है।

शब्दों की आवश्यकता:

  • अज्ञान के गहरे अंधकार में प्रवेश करने के लिए अधिक बातचीत आवश्यक है।

अज्ञान का स्वरूप और निवारण:

  • सचेत अज्ञान ज्ञान के समक्ष स्वयं का बलिदान करती है।

  • त्रुटियों का पारस्परिक विनाश आत्मा को आनंद देता है।

  • अज्ञान अंतर्दृष्टि को धुंधला करता है और झूठा संसार प्रस्तुत करता है।

  • यह अद्भुत जादू अवास्तविकता को वास्तविकता दिखाता है।

संसार की अवास्तविकता:

  • पृथ्वी एक अज्ञात नींव पर टिकी हुई अधिरचना है।

  • यह सब वास्तव में गैर-अस्तित्व वाला है।

  • जब तक सच्चे ज्ञान के लिए जागृत नहीं होते, तब तक इस विशालता को अज्ञान का प्राणी जानो।

  • यह भ्रमित मन का चित्र है, असार है।

मुक्ति का अधिकारी:

  • जिसका मन ब्रह्म की वास्तविकता के बारे में निश्चित है, वही मुक्त होने का हकदार है।

  • बाहरी गतिशील और स्थिर आकृतियाँ मन के विचार हैं।

संसार का भ्रम:

  • पृथ्वी की विशालता क्षणभंगुर मन रूपी पक्षियों को पकड़ने का जाल है।

  • यह सपने के परिदृश्य की तरह झूठा है।

अनासक्ति और ज्ञान का फल:

  • संसार को अनासक्त होकर देखने वाला दुख से मुक्त रहता है।

  • सभी रूपों को निराकार मानने वाला निराकार आत्मा को देखता है।

आत्मा में गुणों का आरोपण:

  • परम आत्मा को दिए गए गुण साफ पानी पर फेंकी गई धूल की तरह हैं।

  • हमारे विचार ही अकल्पनीय को गुण प्रदान करते हैं।

शब्दों का निर्धारण:

  • प्रथा शब्दों के अर्थों को स्थापित करती है और शास्त्रों में उनके उपयोग को निर्धारित करती है।

  • शब्दों के बिना आत्मा समझ से परे है।

शास्त्रों से ज्ञान प्राप्ति:

  • शास्त्रों से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना संभव है।

अज्ञान का प्रदूषण:

  • अज्ञान से दूषित आत्मा अविनाशी जीवन और आनंद प्राप्त नहीं कर सकती।

संसार का अस्तित्व:

  • संसार का अस्तित्व परम के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

  • इस अवास्तविकता से छुटकारा पाने पर ध्यान केंद्रित करो।

भ्रम का त्याग:

  • यह सोचना छोड़ दो कि यह सब कहाँ से आया और इसे वास्तव में कुछ भी नहीं मानो।

पूर्वाग्रह का विनाश:

  • अपनी गलत पूर्वाग्रह को नष्ट करने का प्रयास करो।

  • पूर्वाग्रह से मुक्त पुरुष ही महान और विद्वान हैं।

अज्ञान का खतरा:

  • हानिकारक अज्ञान को नष्ट करो, अन्यथा यह तुम्हें वश में कर लेगा।

  • अज्ञान सभी बुराइयों की जड़ है और पुनर्जन्मों के दर्द का कारण बनता है।

संसार सागर का पार:

  • इस झूठे दृष्टिकोण को त्याग कर संसार के खतरनाक सागर को पार करो।

अध्याय 42 - ब्रह्म से साधारण मन तक: व्यक्तिगत आत्माओं का उत्पादन

अज्ञान और अवास्तविकता का प्रतिकार:

  • अज्ञान एक व्यापक रोग और अवास्तविकता एक महामारी है।

  • इनका निराकरण गहन निरीक्षण से होता है।

मन की शक्तियों की विवेचना (सत्व और रजस के संदर्भ में):

  • पूर्व में उल्लेखित गुणों का विस्तार।

ब्रह्म का स्वरूप:

  • सर्वव्यापी, अविनाशी, अमर, अनादि, अनन्त, त्रुटि रहित बौद्धिक प्रकाश।

बुद्धि का प्रादुर्भाव:

  • ब्रह्म की बुद्धि स्वतः कंपन से उत्तेजित और संघनित होती है।

  • तुलना: समुद्र के जल का स्वयं में आंदोलित होना।

ब्रह्म की शक्ति की क्रिया:

  • सर्वशक्तिमान शक्ति स्वयं में अनन्त काल तक क्रियाशील।

  • तुलना: वायु का शून्यता में स्पंदित होना, अग्नि की लौ का ऊपर उठना।

चेतना और बौद्धिक स्वरूप:

  • ब्रह्म की विशाल, पारभासी आत्मा अपने बौद्धिक क्षेत्र के प्रकाश से चमकती है।

  • चेतना की शक्ति से बौद्धिक स्वरूप उत्पन्न होकर प्रवाहित होते हैं।

  • तुलना: मोतियों की किरणों की श्रृंखला, समुद्र में लहरें।

सर्वोच्च आत्मा का व्यक्तिकरण:

  • परम आत्मा प्रत्येक सीमित रूप में अपनी वैयक्तिक सत्ता स्वीकार करता है।

  • गुणों और विशेषताओं का जुड़ाव (मात्रा, प्रकार आदि)।

चेतना का विभाजन:

  • असार चेतना स्वयं को परम आत्मा से अलग मानकर पदार्थ रूप में अनंतता में विभाजित होती है।

  • तुलना: समुद्र के जल की लहरें।

चेतना और आत्मा की एकता:

  • चेतना और आत्मा मूलतः एक ही हैं, अंतर केवल विचार के कारण।

  • तुलना: स्वर्ण से बने आभूषण, एक ही प्रकाश से जले दीपक।

इच्छाओं का अनुसरण:

  • चेतना आत्मा की शक्ति से क्रियान्वित होकर इच्छाओं का पीछा करती है।

देहात्मन (जीवात्मा) और क्षेत्रज्ञ:

  • चेतना इच्छा और क्रिया के रूप धारण कर देहात्मन कहलाती है।

  • शरीर के ज्ञाता के रूप में क्षेत्रज्ञ कहलाती है।

अहंकार और बुद्धि:

  • इच्छाओं से भरा होने पर अहंकार कहलाता है।

  • कल्पनाओं से दूषित होने पर बुद्धि कहलाता है।

मन और इंद्रियाँ:

  • इच्छाओं की ओर झुकी बुद्धि मन कहलाती है।

  • क्रिया के लिए संघनित मन इंद्रियाँ कहलाता है।

शरीर का निर्माण:

  • इंद्रियाँ ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से जुड़कर शरीर बनाती हैं।

हृदय (चित्त):

  • जीवात्मा विचारों और इच्छाओं से बंधकर दुख के जाल में फँसकर हृदय कहलाती है।

चेतना का क्रमिक विकास और अशुद्धियाँ:

  • चेतना का विकास क्रमिक परिणाम उत्पन्न करता है।

  • ये जीवात्मा की विभिन्न अवस्थाएँ हैं, आत्मा की अशुद्धियाँ।

अहंकार और स्वार्थी इच्छाएँ:

  • जीवात्मा अहंकार से जुड़कर स्वार्थी इच्छाओं के जाल में उलझ जाती है, जो मन बनता है।

कामुक मन और सांसारिक आसक्ति:

  • कामुक मन सांसारिक संपत्तियों को सुरक्षित करने के लिए उत्सुक होता है।

मन की प्रवृत्तियाँ और दूषण:

  • मन अपनी वांछित वस्तुओं का पीछा करता है और उनसे दूषित होता है।

  • तुलना: गाय और बैल, नदी और समुद्र।

इच्छाशक्ति का बंधन:

  • स्वार्थ से दूषित मन अपनी इच्छाशक्ति खो देता है और इच्छाओं से बंध जाता है।

  • तुलना: रेशम के कीड़े का कोकून।

शरीर का बंधन और पश्चाताप:

  • मन इच्छाओं के कारण शरीर को बंधन में डालता है और बंधन की कड़वाहट महसूस करता है।

अज्ञान का उदय:

  • स्वयं को बंधुआ जानकर मन घोर अज्ञान उत्पन्न करता है।

मन की मृत्यु:

  • मन अपनी इच्छाओं की लौ में जलकर मर जाता है।

कर्मों का कर्ता:

  • मन विभिन्न इच्छाओं के अधीन होकर अपने सभी कार्यों का कर्ता स्वयं को मानता है।

दुखों के कारण:

  • मन ज्ञान, बुद्धि, गतिविधि और अहंकार की आठ गुना अवस्थाओं के तहत श्रम करता है, जो दुखों के कारण हैं।

मन के विभिन्न नाम और स्वरूप:

  • प्रकृति, माया, मल, गतिविधि, बंधन, हृदय-मन, अज्ञान, इच्छा।

हृदय-मन की सांसारिक आसक्ति:

  • दुख और पीड़ा की जंजीर से पृथ्वी से बंधा।

  • लालच, शोक और वासनाओं का निवास।

  • वृद्धावस्था और मृत्यु के भय से ग्रस्त।

  • इच्छाओं और घृणा से व्याकुल, अज्ञान और वासनाओं से कलंकित।

  • इच्छाओं के कांटे और कर्मों की झाड़ियों से भरा।

  • अपने मूल को भूल गया, स्वयं की बुराइयों से घिरा।

  • कोकून में रेशम के कीड़े की तरह सीमित।

  • सूक्ष्म होते हुए भी अंतहीन नरकाग्नि का स्थान।

  • आत्मा जितना सूक्ष्म, फिर भी विशाल दिखता है।

संसार का स्वरूप:

  • जहरीले पेड़ों का जंगल, इच्छा का जाल।

  • इच्छाओं के फल स्वादहीन।

मन की विस्मृति:

  • दुख की लौ से जलकर, क्रोध के सर्प द्वारा काटकर, इच्छाओं के सागर में डूबकर ब्रह्म को भूल गया।

  • तुलना: भटका हुआ हिरण, बुद्धिहीन व्यक्ति, जला हुआ पतंगा।

आत्मा से अलगाव और पतन:

  • आत्मा से अलग होकर अनुपयुक्त स्थान पर फेंका गया।

  • तुलना: जड़ से उखाड़ा कमल।

सांसारिक कठिनाइयाँ:

  • खतरों और कठिनाइयों के बीच मनुष्य रेंग रहा है।

  • तुलना: समुद्र में गिरा पक्षी, परियों की भूमि में फँसा व्यक्ति।

मन का उद्धार:

  • मन व्यापार की धारा में बह जाता है, इसे उठाना आवश्यक।

  • तुलना: कीचड़ में डूबता हाथी, भ्रामक पोखर से बैल को उठाना।

दुखी मन और राक्षसी स्वरूप:

  • सुख-दुख और वृद्धावस्था आदि से परेशान मन मनुष्य नहीं, राक्षस जैसा।

अध्याय 43 : जीवात्माओं की विविधताएँ

मुख्य बिंदु:

  • ब्रह्म से जीवात्मा की उत्पत्ति:

    • जीवात्मा ब्रह्म से उत्पन्न होकर मन का रूप धारण करती है।

    • यह संसार के विचारों और चिंताओं से विक्षुब्ध रहती है।

    • अपनी कल्पना में असंख्य रूप धारण करती है।

  • जीवात्मा का पुनर्जन्म:

    • जीवात्मा ने अनेक पूर्व जन्म लिए हैं और आगे भी अनेक जन्मों में प्रवास करेगी।

    • इसके पुनर्जन्म झरने के उड़ते कणों के समान असंख्य होंगे।

    • इच्छाओं के अधीन होकर विभिन्न रूपों में भटकती है।

    • भूमि और जल में विभिन्न दिशाओं और दूर देशों में भ्रमण करती है।

    • विभिन्न कल्पों में जन्मों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है (कुछ पहले, कुछ सौ बार, कुछ असंख्य बार)।

    • कुछ अजन्मे हैं, कुछ मुक्त हो चुके हैं, कुछ वर्तमान में जीवित हैं।

  • जीवात्मा की विभिन्न अवस्थाएँ और लोक:

    • कुछ नरक के दुख भोगते हैं, कुछ पृथ्वी पर थोड़ा आनंद पाते हैं।

    • कुछ स्वर्ग में देवताओं के सुख भोगते हैं, कुछ स्वर्गीय पिंडों की महिमा प्राप्त करते हैं।

    • विभिन्न योनियों में जन्म लेती है: किन्नर, गंधर्व, विद्याधर, सर्प, देवता (सूर्य, इंद्र, वरुण, शिव, ब्रह्मा), राक्षस (कुष्मांड, वेताल, यक्ष, राक्षस)।

    • विभिन्न वर्णों और जातियों में जन्म लेती है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्वपच, चांडाल, किरात, पुक्कास।

    • विभिन्न प्राकृतिक रूपों में जन्म लेती है: घास, बीज, जड़ें, पतंगे, तितलियाँ, जड़ी-बूटियाँ, लताएँ, पत्थर, पेड़ (जामा, कदंब, साल, ताड़, तमाल)।

    • विभिन्न सामाजिक स्थितियों में जन्म लेती है: मंत्री, सेनापति, शासक, भिखारी, संन्यासी, मुनि, तपस्वी।

    • विभिन्न पशु-पक्षियों के रूप में जन्म लेती है: साँप, कीड़े, चींटियाँ, सिंह, भैंस, हिरण, बकरे, सारस, बगुले, हंस, कोयल, हाथी, सूअर, बैल, गधे, मधुमक्खियाँ, मक्खियाँ, मच्छर।

  • जीवात्मा की विभिन्न परिस्थितियाँ:

    • कुछ कठिनाइयों और खतरों में जन्म लेते हैं, कुछ समृद्धि और विपत्ति में।

    • कुछ नरक में, कुछ स्वर्ग में स्थित होते हैं।

    • कुछ तारों में, कुछ पेड़ों के खोखलों में निवास करते हैं।

    • कुछ हवा के सहारे चलते हैं, कुछ स्थिर रहते हैं, कुछ उड़ते हैं।

    • कुछ दिन के प्रकाश में, कुछ रात की चाँदनी में निर्वाह करते हैं।

    • कुछ जड़ी-बूटियों से रस निकालकर जीते हैं।

  • जीवात्मा की मुक्ति और बंधन:

    • कुछ जीवनकाल में मुक्त हो जाते हैं, कुछ आनंदमय अवस्था में रहते हैं, कुछ पूर्ण रूप से ब्रह्म पर आश्रित होकर स्वतंत्र होते हैं।

    • कुछ को मुक्ति के लिए लंबा समय लगता है।

    • कुछ आध्यात्मिकता पर अविश्वास करते हैं और ब्रह्म के साथ एकता को नापसंद करते हैं।

    • कुछ आकाश के शासक बनते हैं, कुछ नदियों के रूप में बहते हैं।

    • कुछ सुंदर स्त्रियाँ, कुछ कुरूप उभयलिंगी बनते हैं।

    • कुछ प्रबुद्ध, कुछ अंधकारमय मन वाले होते हैं।

    • कुछ उपदेशक, कुछ समाधि में स्थित होते हैं।

  • इच्छाओं का प्रभाव:

    • इच्छाओं से वशीभूत जीवात्मा शक्तिहीन हो जाती है और अपनी स्वतंत्रता भूल जाती है।

    • वे आशा और भय में संसार में भटकते हैं।

    • इच्छा के जाल में फँसकर एक शरीर से दूसरे शरीर में जाते हैं।

  • माया और मुक्ति:

    • मन की झूठी कल्पनाओं से उत्पन्न अंतहीन इच्छाएँ माया का जाल फैलाती हैं।

    • जब तक जीवात्मा स्वयं के सच्चे स्वरूप को परम-आत्म के समान नहीं समझ लेती, तब तक संसार में भटकती रहती है।

    • व्यक्तिगत अहंकार के झूठे ज्ञान को त्यागकर सच्चे आत्म को जानकर दिव्य आत्म के साथ अपनी पहचान स्थापित करते हैं।

    • समय के साथ इसे प्राप्त करने पर दुख और शोक के संसार में पुनरागमन के दुर्भाग्य से मुक्ति मिलती है।

  • ज्ञान और पुनर्जन्म:

    • ज्ञान प्राप्ति के पश्चात  कुछ विकृत स्वभाव के कारण पुनः पृथ्वी पर लौटते हैं।

    • कुछ उच्च अवस्थाओं से गिरकर पशु योनियों में जन्म लेते हैं और अंत में नरक में गिरते हैं।

    • कुछ महान आत्माएँ ब्रह्म की अवस्था से आकर एक ही जीवन व्यतीत करती हैं और फिर परम आत्मा में विलीन हो जाती हैं।

  • अन्य लोकों में जीवात्मा:

    • अन्य लोकों में भी असंख्य जीव हैं, जिनमें से कुछ ब्रह्मा और शिव के समान हो गए हैं।

    • उनमें देवता और क्रूर प्राणी भी हैं, साथ ही साँप और अन्य सरीसृप भी हैं, जैसे इस पृथ्वी पर।

    • इस पृथ्वी के समान अन्य लोक भी हैं, और कई बीत चुके हैं, और कई अभी प्रकट होने वाले हैं।

    • अन्य लोकों में विभिन्न अज्ञात कारणों से उत्पन्न विभिन्न आकृतियों के प्राणी हैं, जिनकी वृद्धि और मृत्यु इस पृथ्वी के समान है।

    • उनमें गंधर्व, यक्ष, सुर और असुर भी उत्पन्न होते हैं।

  • जीवन के तरीके और निरंतरता:

    • अन्य भागों के लोगों के जीवन के तरीके इस पृथ्वी के लोगों के समान हैं।

    • सभी प्राणी अपने स्वभाव और पारस्परिक संबंधों के अनुसार हमेशा चलते रहते हैं।

    • संपूर्ण सृष्टि विकास और ह्रास की प्रक्रिया में शाश्वत रूप से आगे बढ़ती है।

  • ब्रह्म से जीवात्मा का संबंध:

    • सभी निर्मित प्राणी अपने स्रोत (ब्रह्म) से अलग हैं, जैसे दीपक से प्रकाश और सूर्य से किरणें।

    • वे लाल गर्म लोहे की चिंगारियों और आग की चमकती लपटों के समान हैं।

    • वे समय के सूक्ष्म क्षणों और फूलों की उड़ती गंधों के समान हैं।

    • जीवन के उड़ते कण अंततः जीवन शक्ति के मुख्य स्रोत में विलीन हो जाते हैं।

    • प्राणवायु के कण ब्रह्मांड में फैलकर सभी लोकों में सजीव प्राणियों के विभिन्न रूप धारण करते हैं।

    • वास्तव में ये सब हमारी अज्ञानता की रचनाएँ हैं, अनन्तता के विशाल समुद्र में पानी की लुढ़कती लहरों की तरह।

अध्याय 44 - ब्रह्मा के स्व-जन्म का वर्णन 

  • राम का प्रश्न:

    • राम पूछते हैं कि दिव्य आत्मा के कण जीवात्माओं का रूप कैसे लेते हैं, यह तो समझ में आता है, लेकिन हड्डियों और पसलियों से बने भौतिक शरीर को कैसे धारण करते हैं, यह कल्पनातीत है।

  • वसिष्ठ का प्रत्युत्तर: पूर्व ज्ञान की याद दिलाना:

    • वसिष्ठ राम को उनके पूर्व के स्पष्टीकरण को याद दिलाते हैं।

    • वे उनकी निगमनात्मक तर्क शक्ति के खो जाने पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं।

  • भौतिक जगत की अवास्तविकता:

    • संसार के सभी भौतिक शरीर और गतिशील/स्थिर वस्तुएँ सपनों के दृश्यों के समान झूठे प्रतिनिधित्व हैं।

    • दृश्यमान जगत सपनों से केवल अवधि और अधिक भ्रामक होने में भिन्न है।

    • तुलना: दो चंद्रमा का दिखना, अंधेरे में पहाड़ का भ्रम।

  • प्रबुद्ध मन का दृष्टिकोण:

    • अज्ञान की तंद्रा से मुक्त और इच्छाओं के बंधनों से छूटा हुआ प्रबुद्ध मन संसार को स्वप्नवत देखता है।

  • संसार की उत्पत्ति:

    • संसार सभी जीवात्माओं की कल्पना में स्वाभाविक रूप से गर्भित एक रचना है।

    • आत्मा के अंतिम मुक्ति प्राप्त करने तक संसार आत्मा पर अंकित रहता है।

  • आत्मा का क्षणभंगुर सार:

    • आत्मा का क्षणभंगुर सार जल की घूमती धारा, बीज का अंकुर या अंकुर का पत्ता के समान है।

  • कल्पना की रचना:

    • जैसे फूल शाखा में और फल फूल में समाहित होता है, वैसे ही कल्पना की यह सृष्टि मन के पात्र में समाहित है।

  • मन की परिवर्तनशीलता:

    • जैसे गिरगिट एक समय में एक रंग दिखाता है, वैसे ही परिवर्तनशील मन उस समय अपने विचार में प्रमुख रूप को दिखाता है।

  • विचारों का भौतिक रूप धारण करना:

    • विचार दृश्य रूप धारण कर लेता है, जैसे मिट्टी बर्तन का रूप लेती है।

    • पूर्व जन्म के अच्छे विचार अगले जन्म में आत्मा को अच्छा रूप देते हैं।

  • ब्रह्मा की उत्पत्ति:

    • शक्तिशाली कमल-जन्मा ब्रह्मा उस फूल की कली में स्थित हैं, जो उनके मन के अच्छे विचारों का परिणाम है।

  • विस्तारित सृष्टि का कारण:

    • यह असीम सृष्टि कल्पना की झूठी रचना है जिससे जीवात्मा मन के साथ मिलकर विरिंचि, ब्रह्मा सृष्टिकर्ता की स्थिति प्राप्त करती है।

  • राम का पुनः प्रश्न:

    • राम पूछते हैं कि क्या अन्य सभी प्राणी भी कमल-जन्मा ब्रह्मा के समान कारण से उत्पन्न हुए हैं।

  • वसिष्ठ का पुनः उत्तर: ब्रह्मा के शरीर की उत्पत्ति का उदाहरण:

    • वसिष्ठ ब्रह्मा के शरीर धारण करने की प्रक्रिया को फिर से बताते हैं ताकि संसार के अस्तित्व को समझा जा सके।

  • परम आत्मा का सीमित रूप धारण करना:

    • समय और स्थान से असीमित परम आत्मा अपनी इच्छा और सर्वशक्तिमत्ता से समय और स्थान के सीमित रूप लेता है।

    • वही जीवात्मा बनता है और अनेक बनने की इच्छाओं से भर जाता है।

  • ब्रह्मा का हिरण्यगर्भ रूप में परिवर्तन:

    • जब ब्रह्मा अपने पूर्व कल्प में हिरण्यगर्भ होने की स्थिति पर विचार करते हैं, तो वे तुरंत उस मनोगत स्थिति में परिवर्तित हो जाते हैं।

  • तत्वों की उत्पत्ति का क्रम:

    • सबसे पहले ध्वनि का पात्र स्पष्ट आकाश का विचार।

    • मन में संघनित होकर वायु की तरह कंपन।

    • फिर वायु के कंपनों का विचार, जो त्वचा और मन से महसूस होते हैं।

    • वायु और हवा के विचारों से अदृश्य रूप धारण करना।

    • वायु और हवा के तत्वों के संघनन से प्रकाश का विचार, जो दृष्टि का कारण है।

    • वायु, हवा और प्रकाश के त्रिक विचारों से अग्नि का गुण उत्पन्न होना।

    • तुरंत शीतलता का विचार उत्पन्न होना, जो जल का गुण है।

    • मन द्वारा वायु, हवा, अग्नि और जल के चार तत्वों के विचारों का निर्माण।

    • इन तत्वों के एक साथ जुड़ने से पृथ्वी का स्थूल रूप, गंध का पात्र उत्पन्न होना।

    • मन द्वारा सूक्ष्म मौलिक कणों के विचारों से आत्मा के सूक्ष्म रूप का पांच तत्वों के स्थूल शरीर के लिए त्याग।

  • आध्यात्मिक शरीर का निर्माण:

    • मन ने इस शरीर को आकाश में आग की चिंगारी की तरह चमकते हुए देखा, जिसने आत्मभाव, अहंकार और समझ के साथ मिलकर व्यक्तित्व बनाया।

    • यह आठ गुना अवतार के भीतर आध्यात्मिक शरीर है।

  • आध्यात्मिक शरीर की स्थिति और कार्य:

    • आध्यात्मिक शरीर कमल जैसे हृदय के मध्य में मधुमक्खी की तरह स्थित है।

    • यह अपने आंतरिक कार्यों से बाहरी शरीर को वृद्धि प्रदान करता है।

    • यह हृदय की क्रिया से गाढ़ा होता है।

  • आंतरिक मन का प्रभाव बाहरी शरीर पर:

    • बाहरी शरीर आंतरिक मन के गुणों को प्राप्त करता है।

    • तुलना: सोने में मिला हुआ रत्न।

  • आत्मा/मन के गुण का प्रकटीकरण:

    • आंतरिक आत्मा/मन का गुण बाहरी शरीर में उसी तरह प्रकट होता है जैसे बीज का गुण फल में।

  • कर्मों के विचार और शारीरिक क्रियाएँ:

    • मन अपनी क्रियाओं के विचारों पर ध्यान केंद्रित करता है, जो शरीर के विभिन्न अंगों और क्रियाओं में व्यक्त होते हैं।

    • तुलना: बीज से पेड़ के पत्ते और शाखाएँ निकलना।

  • शारीरिक गतिविधियों का कारण:

    • ऊपर और नीचे के विचार सिर और पैरों को उठाते और झुकाते हैं।

    • दोनों ओर के विचार भुजाओं को फैलाते हैं।

    • आगे और पीछे के विचार पीठ और पेट की स्थिति निर्धारित करते हैं।

    • सिर और उंगलियों के बाल पेड़ों के तंतुओं और टहनियों की तरह हैं।

  • ब्रह्मा का शारीरिक निर्माण:

    • इस प्रकार ब्रह्मा ने, जिनका शरीर मन से उत्पन्न हुआ था, अपनी आवश्यकताओं के विचारों के अनुसार अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों का निर्माण किया।

    • उन्होंने शरीर और अंगों को सघनता प्रदान की।

    • तुलना: ऋतुएँ फलों और अनाजों को पूर्णता प्रदान करती हैं।

  • समय और पूर्णता:

    • सब कुछ समय पर पूर्ण होता है, और सभी प्राणियों के सुंदर शरीर और आकार होते हैं।

  • ब्रह्मा: सभी प्राणियों के जनक:

    • भगवान ब्रह्मा शक्ति, समझ, गतिविधि, गरिमा और ज्ञान के गुणों से भरे सभी प्राणियों के जनक थे।

  • ब्रह्मा का निवास और स्वरूप:

    • खाली ब्रह्म से उत्पन्न होकर वे शून्यता की गोद में निवास करते हैं।

    • वे पिघले हुए सोने के रूप के हैं।

  • ब्रह्मा का मन और भ्रम:

    • सर्वोच्च में स्थित होने पर भी ब्रह्मा का मन अपनी ही बनाई हुई गलतियों के लिए उत्तरदायी है।

    • कभी-कभी वे अपने स्रोत की तरह बिना शुरुआत, मध्य या अंत के होने को भूल जाते हैं।

  • ब्रह्मा के विभिन्न मनोगत विचार:

    • कभी स्वयं को सृष्टि से पहले के जलों के समान मानते हैं।

    • कभी ब्रह्मांडीय अंडे के समान मानते हैं।

    • कभी सृष्टि से पहले के अंधकारमय जंगल के समान मानते हैं, फिर कमल के बिस्तर के समान।

    • बाद में सृष्टि के प्रत्येक चरण में अनेक रूप धारण करते हैं।

  • ब्रह्मा: प्राणियों के संरक्षक:

    • इस प्रकार ब्रह्मा प्रत्येक कल्प-काल में अपनी इच्छा से अपने मन से बनाए गए अनेक प्रकार के प्राणियों के संरक्षक बने।

  • ब्रह्मा का प्रथम प्रादुर्भाव:

    • ब्रह्मा स्वयं ब्रह्म से उत्पन्न होने वाले पहले प्राणी थे।

  • ब्रह्मा की प्रारंभिक अवस्था:

    • पहली बार उत्पन्न होने पर ब्रह्मा अचेतनता और विस्मृति की आनंदमय अवस्था में रहे।

  • चेतना का उदय और भौतिक शरीर:

    • गर्भ में मानसिक निष्क्रियता से मुक्त होने पर उन्होंने प्रकाश देखा।

    • उन्होंने सांसों और श्वसन के साथ एक भौतिक शरीर धारण किया।

    • शरीर बालों के छिद्रों से ढका, मसूड़ों और बत्तीस दांतों से सुसज्जित था।

    • पिंडली, जांघ और रीढ़ की हड्डियों के तीन आधार पैरों पर खड़े थे।

    • पांच वायु, पांच विभाजन, नौ छिद्र और चिकनी त्वचा सभी अंगों को ढँक रही थी।

    • बीस उंगलियां और नाखून, दो भुजाएं और हथेलियां, और दो या अधिक हाथ और आंखें थीं।

  • शरीर का प्रतीकात्मक वर्णन:

    • शरीर मन रूपी पक्षी का घोंसला, काम रूपी साँप का बिल, लालच रूपी राक्षस की गुफा, जीवन रूपी सिंह की मांद है।

    • यह अहंकार रूपी हाथी के पैरों की जंजीर और इच्छाओं के कमलों का तालाब है।

  • ब्रह्मा का आत्म-निरीक्षण:

    • भगवान ब्रह्मा ने अपने सुंदर शरीर को देखा और उसे अच्छा पाया।

  • ब्रह्मा का चिंतन और ज्ञानोदय:

    • अतीत, वर्तमान और भविष्य के तीन कालों के अपने दृष्टिकोण से और आकाश के अवलोकन से वे सोचने लगे कि यह असीम स्थान क्या है, पहले क्या था और वे कैसे अस्तित्व में आए।

    • इस प्रकार विचार करते हुए वे अपनी आत्मा में प्रबुद्ध हुए।

  • ब्रह्मा का पूर्व सृष्टियों का स्मरण:

    • उन्होंने अपने मन में विभिन्न पिछली सृष्टियों को देखा और पृथ्वी पर विकसित हुए विभिन्न धर्मों और संप्रदायों को याद किया।

  • वेदों की उत्पत्ति:

    • उन्होंने पवित्र वेदों को उसी प्रकार उत्पन्न किया जैसे वसंत फूलों को।

  • प्राणियों की रचना:

    • उन्होंने अपने मन में उनके मूलरूपों से सभी प्रकार के प्राणियों को आसानी से बनाया।

  • नियम और रीति-रिवाज:

    • उन्होंने उन्हें उनके लौकिक और आध्यात्मिक कल्याण के लिए विभिन्न नियमों और रीति-रिवाजों में स्थापित किया।

  • शास्त्रों की उत्पत्ति:

    • अपने शाश्वत मन में उनके मूलरूपों से ब्रह्मा ने असंख्य प्रकार के शास्त्रों पर विचार किया जो पहले अस्तित्व में थे और जो पृथ्वी पर दृश्य रूपों में प्रकट हुए।

  • ब्रह्मा का कमल-जन्मा रूप और सृष्टि:

    • इस प्रकार, हे राम, ब्रह्मा ने स्वयं पर कमल-जन्मा का रूप धारण किया और अपनी गतिविधि से अपने मन में मौजूद मॉडलों से सभी विभिन्न प्राणियों की सृष्टि की, जिन्होंने उनकी इच्छा से दृश्यमान संसार में अपने विभिन्न रूप धारण किए।

इस अध्याय में राम ब्रह्मा के भौतिक शरीर धारण करने के विषय में अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं। वसिष्ठ उत्तर देते हुए भौतिक जगत की अवास्तविकता और मन की कल्पना शक्ति को सृष्टि का मूल कारण बताते हैं। वे कहते हैं कि संसार स्वप्नवत है और आत्मा का क्षणभंगुर सार विभिन्न रूपों को धारण करता है।

वसिष्ठ ब्रह्मा के उदाहरण द्वारा सृष्टि प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हैं। परम आत्मा अपनी इच्छा और सर्वशक्तिमत्ता से समय और स्थान के सीमित रूप लेता है और जीवात्मा बनता है। ब्रह्मा अपने पूर्व कल्प के हिरण्यगर्भ रूप पर विचार करके उसी स्थिति को प्राप्त करते हैं। वे क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी जैसे तत्वों की उत्पत्ति की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं, जो मन के विचारों के संघनन से होती है।

आध्यात्मिक शरीर का निर्माण होता है, जो हृदय में स्थित होकर बाहरी शरीर को विकसित करता है। आंतरिक मन का प्रभाव बाहरी शरीर पर पड़ता है, जैसे बीज का गुण फल में दिखता है। ब्रह्मा अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अपने शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण करते हैं और समय के साथ सभी प्राणी सुंदर शरीर और आकार प्राप्त करते हैं।

वसिष्ठ ब्रह्मा को सभी प्राणियों का जनक बताते हैं, जो खाली ब्रह्म से उत्पन्न होकर शून्यता में निवास करते हैं। ब्रह्मा का मन भी भ्रमों से ग्रस्त हो सकता है। वे सृष्टि से पहले के विभिन्न रूपों और अवस्थाओं पर विचार करते हैं। ब्रह्मा प्रत्येक कल्प में अपनी इच्छा से विभिन्न प्राणियों की सृष्टि करते हैं, और वे स्वयं ब्रह्म से उत्पन्न होने वाले पहले प्राणी थे।

ब्रह्मा के प्रथम प्रादुर्भाव, चेतना का उदय और भौतिक शरीर धारण करने की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। शरीर को मन, काम, लालच और अहंकार आदि का निवास स्थान बताया गया है। ब्रह्मा अपने सुंदर शरीर का निरीक्षण करते हैं और सृष्टि के रहस्य पर विचार करते हुए प्रबुद्ध होते हैं। वे पिछली सृष्टियों और वेदों को स्मरण करते हैं और अपनी मनःशक्ति से विभिन्न प्राणियों और शास्त्रों की रचना करते हैं। इस प्रकार, ब्रह्मा अपनी मनोगत शक्ति से दृश्यमान संसार में विभिन्न रूपों की सृष्टि करते हैं।

अध्याय 45 - सब कुछ ईश्वर पर निर्भर; जो अस्तित्व में नहीं है वह नष्ट नहीं होता

संसार की अवास्तविकता:

  • ठोस प्रतीत होता है पर सारहीन।

  • शून्यता, मन की छवियों का प्रदर्शन।

  • समय और स्थान किसी संसार से नहीं, महान आत्मा से भरे।

  • काल्पनिक, स्वप्निल, अनंत शून्यता में भ्रम।

  • बिना आधार की चित्रकला, अवास्तविकताओं का दर्शन।

  • बिना बनाई गई रचना, बिना कैनवास की बहुरंगी तस्वीर।

मन और स्मृति की भूमिका:

  • मन की कल्पना से त्रिलोकों और शरीरों का विस्तार।

  • स्मृति इन रचनाओं का कारण, जैसे दृष्टि दर्शन का।

परम आत्मा से अभिन्नता:

  • संसार का प्रदर्शन झूठा, चित्रकला में उभार-अवसाद जैसा।

  • परम आत्मा से अलग नहीं, जैसे नींव पर इमारतें।

मन की सर्वशक्तिमत्ता:

  • मन अपना घर (शरीर) बनाता है, जैसे रेशम के कीड़े कोकून।

  • आत्मा के भी आवरण।

  • मन अपनी कल्पना में कुछ भी बना/प्राप्त कर सकता है, चाहे कितना भी कठिन लगे।

  • एकांत मन में सर्वशक्तिमत्ता जैसी शक्ति।

ईश्वर की इच्छाशक्ति:

  • ईश्वर की इच्छा से कुछ भी हो/न हो सकता है।

  • मन यदि शरीर बना सकता है, तो सर्वशक्तिमान सब कुछ बना/बिगाड़ सकते हैं।

  • दिव्य इच्छा से देवता, अर्धदेव और मानव जाति का अस्तित्व।

  • इच्छा समाप्त होने पर अस्तित्व समाप्त, जैसे तेल बिना दीपक बुझना।

दिव्य इच्छा का प्रदर्शन:

  • आकाश और उसके नीचे सब कुछ दिव्य इच्छा से प्रदर्शित।

  • ब्रह्मांड स्वप्न के दृश्य जैसा।

वास्तविक अनस्तित्व:

  • यहाँ कुछ भी पैदा या मरता नहीं, सब कुछ सच्चे अर्थ में कुछ भी नहीं।

  • अस्तित्वहीन में कुछ भी अधिक/कम नहीं होता।

  • निराकार आत्मा का शरीर कैसे? अविभाजित आत्मा का विभाजन कैसे?

भ्रम का दर्शन:

  • सभी शरीर निराकार।

  • जैसे सूर्य की गर्मी से मृगतृष्णा, वैसे मन की निश्चितता से झूठे रूप सच्चे लगते हैं।

  • ब्रह्मा आदि भी कल्पना के प्राणी, दो चंद्रमाओं के दर्शन जैसे झूठे।

  • मन का भ्रम संसार के झूठे रूप दिखाता है।

सापेक्ष गति:

  • नाव में यात्री को स्थिर वस्तुएँ चलती दिखती हैं, वैसे ही दृश्यमान वस्तुएँ दिखती हैं।

माया का जादू:

  • संसार भ्रम (माया) के जादू से प्रस्तुत जादुई दृश्य, मन की रचना।

  • वास्तविकता प्रतीत होते हुए भी कुछ नहीं।

ब्रह्म ही सब कुछ:

  • यह सारा संसार ब्रह्म, उसके अलावा और क्या?

  • उसका और क्या उपादान? वह क्या है? कहाँ से आया? कहाँ स्थित?

भ्रम के उपांग:

  • पहाड़, पेड़ आदि हमारी त्रुटि से लगाए गए उपांग।

  • मन का पूर्वाग्रह अवास्तविकता को वास्तविकता दिखाता है।

  • संसार भ्रम की रचना, मूर्खों की मूर्ति।

अलौकिक आत्मा का चिंतन:

  • प्रिय इच्छाओं और विचारों को त्यागकर अलौकिक आत्मा का चिंतन करो।

संसार की क्षणभंगुरता:

  • संसार लंबे सपने के स्वप्निल दृश्य, मन की कल्पना के आकाश में इमारत जैसा झूठा।

  • देखने में ठोस, महसूस करने में असार।

  • इच्छाओं के साँपों का बिल।

अवास्तविकता का ज्ञान:

  • संसार को अवास्तविक जानकर कुछ भी नहीं मानने की कोशिश करो।

  • बुद्धिमान मृगतृष्णा के पीछे नहीं भागते।

  • काल्पनिक इच्छाओं के पीछे भागने वाला मूर्ख परेशानी पाता है।

  • अवास्तविकता जानकर कुछ पाने की इच्छा रखने वाला वास्तविकता त्यागकर नष्ट होता है।

मन की त्रुटि:

  • मन की त्रुटि रस्सी को साँप समझने की गलती कराती है।

  • विचारों और प्रयासों की विविधता से मनुष्य संसार में घूमते हैं।

व्यर्थ विचार का भ्रम:

  • मन में व्यर्थ विचार का श्रम, जैसे पानी में चंद्रमा का हिलना।

  • केवल बच्चों को धोखा देता है, बुद्धिमानों को नहीं।

पुण्य का अनुसरण:

  • भविष्य के सुख के लिए पुण्य का अनुसरण अज्ञान के पाले को नष्ट करता है।

मन की रचनाएँ:

  • संसार के सभी स्थूल शरीर मन के कामकाज के प्राणी, आकाश में महल बनाने जैसे।

  • हृदय की इच्छा से उत्पन्न, इच्छा की कमी से नष्ट।

  • अवास्तविकताएँ परियों की भूमि की तरह सच्ची दिखती हैं।

अस्तित्व और अनस्तित्व:

  • अस्तित्व में कुछ भी नष्ट नहीं होता, गैर-अस्तित्व कभी अस्तित्व में नहीं आता।

मन की कल्पनाएँ:

  • क्या चीजें पूरी/टूटी, बढ़ रही/क्षय हो रही हैं, ये मन की कल्पनाएँ हैं।

  • बच्चे मिट्टी की गुड़िया बनाते-तोड़ते हैं, वैसे मन विचारों को उठाता-मिटाता है।

जादुई भ्रम:

  • जादूगर के करतब में कुछ खोता नहीं, वैसे संसार के जादुई सागर में कुछ मरता/विघटित नहीं।

  • अवास्तविकताएँ झूठी होने से उनके नुकसान से कुछ नहीं खोता।

  • इस अवास्तविक संसार में आनंद/शोक का कोई कारण नहीं।

शून्यता में क्या खोना?

  • यदि संसार पूरी तरह अवास्तविकता, तो उसमें क्या खो सकता है?

  • यदि कुछ भी वास्तव में नहीं खोता, तो बुद्धिमानों के शोक का क्या कारण?

ईश्वर ही परम अस्तित्व:

  • यदि ईश्वर ही परम अस्तित्व, तो हमारे पास खोने के लिए और क्या?

  • ब्रह्मांड ब्रह्म से भरा होने से आनंद/शोक का कोई कारण नहीं।

अवास्तविकता की वृद्धि नहीं:

  • यदि अवास्तविकता कभी अस्तित्व में नहीं आ सकती, तो उसकी वृद्धि नहीं हो सकती।

  • उनकी वृद्धि/अस्तित्व की कमी के लिए शोक क्यों?

भ्रम का कारण:

  • सब कुछ केवल अवास्तविक और भ्रम का कारण।

  • बुद्धिमान क्या इच्छा करे जो सबसे अच्छा वरदान हो?

दिव्य आत्मा से परिपूर्णता:

  • सब कुछ दिव्य आत्मा से परिपूर्ण होने से बुद्धिमान के लिए त्यागने/लेने से इंकार करने योग्य तुच्छ चीज क्या?

लाभ-हानि में समता:

  • संसार को अवास्तविकता मानने वाला लाभ-हानि में आनंद/शोक के अधीन नहीं।

  • केवल अज्ञानी उत्साहित/उदास होते हैं।

वर्तमान की शून्यता:

  • जो पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, वह वर्तमान में भी शून्यता।

  • गैर-अस्तित्व की इच्छा रखने वाला स्वयं कुछ नहीं।

शाश्वत अस्तित्व:

  • जो पहले था, अंत में होगा, वही अब भी अस्तित्व में।

  • जो हमेशा अस्तित्व में है, वही हर जगह और हर समय दिखता है।

भ्रम के दर्शन:

  • पानी के नीचे अवास्तविक आकाश, चंद्रमा, तारे।

  • केवल भ्रमित बच्चा पसंद करता है, बुद्धिमान नहीं।

बच्चों की पसंद:

  • बच्चे बेकार और भड़कीले गहनों को पसंद करते हैं।

  • लाभ से अच्छा पाने के बजाय नुकसान पर दुखी होना पसंद करते हैं।

बुद्धिमानों का आचरण:

  • हे कमल नेत्र राम, बच्चे की तरह कार्य करो पर बुद्धिमानों की तरह क्षणभंगुर को अस्थायी देखो।

  • केवल शाश्वत पर भरोसा रखो।

वास्तविकता की शून्यता:

  • हे राम, यह जानकर दुखी/खेद न करो कि यह सब, स्वयं और मैं, वास्तव में कुछ नहीं।

परम सत्ता:

  • यह जानकर प्रसन्न/खुश न हो कि यह सब और हम वास्तविक সত্তाएँ हैं।

  • विचार करो ये हों या न हों।

  • एक ही সত্তा सब कुछ बनती और बिगड़ती है।

  • एक ही সত্তा सब कुछ बनती है।

दिन का अंत और सभा का विसर्जन:

  • ऋषि के समझाने पर दिन ढल गया।

  • सूर्य संध्या और सभा विसर्जित।

पुनः सभा और चर्चा जारी:

  • अगले दिन सूर्योदय पर सभा पुनः एकत्र हुई।

  • ऋषि और राम के बीच चर्चा जारी रही (यह निहित है, विस्तृत नहीं)।

सारांश:

यह अध्याय अद्वैत वेदांत के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है, जिसमें संसार को माया या भ्रम बताया गया है और ब्रह्म को एकमात्र परम सत्य के रूप में स्थापित किया गया है। वसिष्ठ विभिन्न तर्कों और दृष्टांतों का उपयोग करके यह समझाने का प्रयास करते हैं कि हमारी इंद्रियों द्वारा अनुभव किया जाने वाला जगत वास्तविक नहीं है, बल्कि यह मन की कल्पना और अज्ञान का परिणाम है।

सपनों और मृगतृष्णा के उदाहरण हमारी दैनिक अनुभवों में मौजूद भ्रमों को दर्शाते हैं, जिन्हें वसिष्ठ संसार की व्यापक अवास्तविकता को समझने के लिए एक रूपक के रूप में उपयोग करते हैं। वे मन की रचनात्मक शक्ति पर जोर देते हैं, जो अपनी कल्पना में जटिल और विस्तृत संसारों का निर्माण कर सकता है, यह तर्क देते हुए कि भौतिक जगत भी इसी प्रकार मन की एक रचना है।

ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का उल्लेख यह स्थापित करने के लिए किया गया है कि परम সত্তा ही सभी चीजों का आधार और कारण है। सृष्टि और विनाश ईश्वर की इच्छाशक्ति से होते हैं, और संसार की क्षणभंगुरता इस निर्भरता को दर्शाती है।

आत्मा की निराकारता और अविभाज्यता का सिद्धांत व्यक्तिगत पहचान और भेद के भ्रम को दूर करता है। यदि आत्मा वास्तव में अविभाजित है, तो व्यक्तिगत अस्तित्व और संसार में मौजूद द्वैत केवल मन की अवधारणाएँ हैं।

'ब्रह्म ही सब कुछ है' का कथन अद्वैत वेदांत का सार है। इसके अनुसार, ब्रह्म के अतिरिक्त कोई अन्य स्वतंत्र सत्ता नहीं है। संसार, अपनी विविधता और जटिलता के बावजूद, ब्रह्म से अलग नहीं है, बल्कि ब्रह्म का ही एक अभिव्यक्ति है।

अनासक्ति और समभाव का महत्व इसलिए बताया गया है क्योंकि यदि संसार वास्तव में भ्रम है, तो इसमें किसी भी वस्तु या घटना से आसक्त होना या सुख-दुख से प्रभावित होना अज्ञान का प्रतीक है। ज्ञानी व्यक्ति इस सत्य को जानकर शांत और स्थिर रहता है।

अध्याय का अंतिम भाग वास्तविकता और शून्यता के परस्पर संबंध पर विचार करता है। वसिष्ठ कहते हैं कि परम वास्तविकता में सब कुछ शून्य है, जिसका अर्थ है कि संसार का कोई स्वतंत्र या स्थायी अस्तित्व नहीं है। एक ही परम सत्ता विभिन्न रूपों में प्रकट होती है, लेकिन उसका मूल स्वरूप अपरिवर्तनीय रहता है।

कुल मिलाकर, यह अध्याय हमें संसार की क्षणभंगुरता और अवास्तविकता को समझने और परम सत्य, ब्रह्म में स्थित होने के लिए प्रेरित करता है। यह वैराग्य और अनासक्ति के महत्व पर जोर देता है ताकि हम सांसारिक दुखों से मुक्त होकर स्थायी आनंद को प्राप्त कर सकें।

अध्याय 46 - जीवन्मुक्ति का वर्णन

  • सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता:

    • सुखद घर, परिवार, धन रहने तक दुख नहीं, पर क्षणिक जानकर जाने पर शोक क्यों?

    • आकाश के महल की भव्यता/विनाश से क्या सुख/दुख?

    • अज्ञानी बच्चों में क्या खुशी, उनकी मृत्यु पर क्या शोक?

    • धन/परिवार की वृद्धि में क्या आनंद, प्यास न बुझाने वाली मृगतृष्णा की तरह।

  • सांसारिक आसक्ति का दुख:

    • धन/परिवार बढ़ने से चिंता बढ़ती है।

    • सांसारिक संपत्ति और स्नेह की वृद्धि में खुशी नहीं।

  • ज्ञानी और अज्ञानी के भोग:

    • अज्ञानी कामुक के लिए आनंददायक भोग ज्ञानी, संयमी के लिए बेस्वाद।

  • ज्ञानी का लक्ष्य:

    • बुद्धिमान अपना स्थायी कल्याण चाहते हैं।

    • अस्थायी धन/परिवार में क्या आनंद जिसके प्रति वे उदासीन हैं?

  • बुद्धिमान आचरण:

    • हे राम, संसार में बुद्धिमान बनो।

    • क्षणिक को त्याग दो, जो मिले उसे ग्रहण करो।

    • जो नहीं उसका त्याग, जो है उसका भोग - ज्ञानी के लक्षण।

  • संसार के खतरे:

    • इस हैरान करने वाले संसार का ध्यान रखो जहाँ शत्रु धोखेबाज रूपों में छिपे हैं।

    • बुद्धिमान बनकर मूर्खों के खतरों से बचो।

  • मूर्खों की नासमझी:

    • जो गहराई से नहीं देखते और संसार को छल रहित मानते हैं वे बड़े मूर्ख हैं।

    • मूर्ख धोखेबाजों की बातों में आकर प्रलोभनों में पड़ते हैं।

  • सही समझ वालों का विवेक:

    • सही समझ वाले उन पर भरोसा नहीं रखते, त्रुटियों में नहीं पड़ते।

  • ज्ञान की महिमा:

    • अवास्तविकताओं को जानने वाला और किसी पर भरोसा न रखने वाला ज्ञानी है, त्रुटिहीन।

  • क्षणिकता का ज्ञान:

    • स्वयं को संसार में क्षणभंगुर जानकर, दोनों पर विश्वास न रखने वाला भ्रम में नहीं पड़ता।

  • सत्य का आश्रय:

    • इस और अगले जीवन की अवास्तविकता/वास्तविकता के बीच सत्य का आश्रय लो।

    • न पूरी तरह स्वीकारो न त्यागो।

  • उदासीनता में सुख:

    • व्यवसाय में लगे रहकर भी उदासीन रहो, इच्छा रहित उदासीन ही सुखी हैं।

  • अनासक्ति का आदर्श:

    • जिसे न चाहने को कुछ, न छोड़ने को, कर्तव्यवश जीता है, वह कमल पत्ते सा निर्लिप्त।

  • आत्मा की निर्लिप्तता:

    • इंद्रिय अंग बाहरी कार्य करें या न करें, आत्मा को बेफिक्र रखो।

  • मन का वैराग्य:

    • इंद्रिय विषयों को अपना मानकर मन को न डुबोएं, पूर्ण वैराग्य से प्रबंधित करें या न करें।

  • ज्ञान की पराकाष्ठा:

    • हे राम, जब इंद्रिय विषय स्वादहीन लगें, तो जानो आध्यात्मिक ज्ञान की पराकाष्ठा पा ली, संसार सागर पार कर लिया।

  • मुक्ति का स्वरूप:

    • साकार/निराकार, जीवित/मृत, जिसने इंद्रिय भोगों का स्वाद त्याग दिया, उसने बिना इच्छा किए मुक्ति पा ली।

  • मन को इच्छाओं से अलग करना:

    • हे राम, बुद्धि से मन को इच्छाओं से अलग करो, जैसे फूलों से इत्र।

  • संसार सागर का पार:

    • इच्छाओं की लहरों में न बहने वाले संसार सागर पार कर गए, अन्य डूबे।

  • समझ की तीक्ष्णता:

    • समझ को उस्तरे सा तेज करो, संदेह मिटाओ, आत्मा का अवलोकन कर आध्यात्मिक आनंद में प्रवेश करो।

  • ज्ञानी का आचरण:

    • सच्चे ज्ञानियों की तरह घूमो, बुद्धि से मन को ऊंचा करो।

    • वर्तमान में जीने वाले अज्ञानी संसारी की तरह नहीं।

  • जीवन्मुक्तों का अनुकरण:

    • संसार में आचरण करते समय जीवन्मुक्त महान आत्माओं का अनुकरण करो, जो स्वयं में संतुष्ट हैं।

    • लालची और दुष्टों का अनुसरण मत करो।

  • दोनों लोकों का ज्ञान:

    • दोनों लोकों के ज्ञानी देश के रीति-रिवाजों को न तुच्छ समझते न चिपकते, सामान्य लोगों की तरह पालन करते हैं।

  • महान पुरुषों का स्वभाव:

    • सत्य जानने वाले महान पुरुष शक्ति, गुणों, सम्मान, समृद्धि पर गर्व नहीं करते।

    • विपत्ति से उदास, समृद्धि से उत्साहित नहीं होते, सूर्य की तरह स्थिर रहते हैं।

  • ज्ञानी योद्धा:

    • महान मन योद्धाओं की तरह ज्ञान के कवच में शरीर रूपी रथ पर सवार होते हैं।

    • उनकी अपनी कोई इच्छा नहीं, समय के अनुसार आचरण करते हैं।

  • राम का ज्ञान:

    • हे राम, तुमने भी दर्शनशास्त्र में व्यापक ज्ञान प्राप्त कर लिया है।

    • अपनी दूरदर्शिता से स्वयं को आसानी से प्रबंधित कर सकते हो।

  • इंद्रिय निग्रह और वैराग्य:

    • देखने योग्य को देखना दबा दो, अभिमान और शत्रुता से बचो।

    • फिर जहाँ चाहो घूमो, सफलता मिलेगी।

  • शांत स्थिरता:

    • सभी परिस्थितियों में शांत रहो, वर्तमान से अनासक्त, भविष्य जानने की इच्छा रखो।

    • मन की शांत स्थिरता रखो, जहाँ चाहो जाओ।

  • राम का प्रबोधन:

    • ऋषि के शुद्ध सिद्धांतों से सलाह पाकर राम का चेहरा चमक उठा।

    • ज्ञान के अमृत से परिपूर्ण होकर शीतल किरणों वाले चंद्रमा की तरह चमके।

यह अध्याय जीवन्मुक्ति, अर्थात जीवित रहते हुए मुक्ति की अवस्था का वर्णन करता है। वसिष्ठ राम को सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता और उनमें निहित दुखों का बोध कराते हैं। वे कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति संसार की नश्वर प्रकृति को जानकर उसमें अनासक्त रहता है और सुख-दुख में समान भाव रखता है।

वसिष्ठ सांसारिक आसक्ति को दुख का कारण बताते हैं और वैराग्य को परम आनंद की प्राप्ति का मार्ग दर्शाते हैं। वे ज्ञानी और अज्ञानी के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट करते हैं। अज्ञानी सांसारिक भोगों में लिप्त रहता है जबकि ज्ञानी उनसे विरक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होता है।

इस अध्याय में अनासक्ति के आदर्श को विस्तार से समझाया गया है। ज्ञानी व्यक्ति कर्तव्य भाव से कर्म करता है लेकिन उसके फल में आसक्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी उससे निर्लिप्त रहता है। मन को इंद्रिय विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर होने पर जीवन्मुक्ति की अवस्था प्राप्त होती है।

वसिष्ठ राम को अपनी बुद्धि का उपयोग करके मन को इच्छाओं से अलग करने की सलाह देते हैं। वे संसार सागर को पार करने के लिए समझ की तीक्ष्णता और संदेहों के निवारण पर जोर देते हैं। ज्ञानी व्यक्ति वर्तमान और भविष्य के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखता है और जीवन्मुक्त महापुरुषों का अनुकरण करता है।

महान पुरुषों के गुणों का वर्णन किया गया है, जो शक्ति, सम्मान या समृद्धि पर गर्व नहीं करते और विपत्ति-समृद्धि में समान रहते हैं। वे ज्ञान के रथ पर सवार होकर समय के अनुसार आचरण करते हैं।

अंत में, वसिष्ठ राम को इंद्रिय निग्रह, अभिमान और शत्रुता से बचने तथा शांत चित्त और अनासक्त रहने का उपदेश देते हैं, जिससे उन्हें जीवन में सफलता और शांति प्राप्त हो सके। ऋषि के उपदेशों से राम का मन प्रबुद्ध होता है और वे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो उठते हैं।

अध्याय 47 - असंख्य विभिन्न लोकों, उनके देवताओं और समय का वर्णन

असंख्य ब्रह्मा, शिव, इंद्र, नारायण:

  • लाखों ब्रह्मा, सैकड़ों शिव, इंद्र और हजारों नारायण बीत चुके हैं।

विभिन्न लोकों में भिन्न प्राणी:

  • अनेक अन्य लोकों में भिन्न रीति-रिवाजों वाले विभिन्न प्राणी।

सृष्टि की विविधता और काल:

  • एक साथ अनेक सृष्टियाँ, दूर-दूर के समय में जन्म।

  • ब्रह्मा और अन्य देवताओं का जन्म जादू के शो जैसा अद्भुत।

देवताओं की उत्पत्ति के विभिन्न प्रकार:

  • कुछ में ब्रह्मा प्रथम, कुछ में विष्णु, कुछ में शिव।

  • कुछ में मुनि पितृपुरुष।

  • कमल-जन्मा, जल-जन्मा, अंडज, वायु-जन्मा ब्रह्मा।

  • एक अंडे में सूर्य, दूसरे में इंद्र।

  • एक में विष्णु, दूसरे में शिव।

पृथ्वी के विभिन्न स्वरूप:

  • कभी बिना छेदों की ठोस पृथ्वी, कभी वनस्पति से भरी।

  • कभी पहाड़ों से भरी, फिर प्राणियों से ढकी।

  • कहीं सोना, कहीं कठोर भूमि, कहीं मिट्टी, कहीं धातुएँ।

अद्भुत लोक:

  • ब्रह्मांड में अद्भुत लोक, कुछ और भी अद्भुत।

  • कुछ चमकदार, कुछ की रोशनी हम तक नहीं पहुँची।

लोकों की संख्या और गति:

  • ब्रह्मा के सार के निर्वात में असंख्य लोक बिखरे, समुद्र में लहरों की तरह।

  • लोकों की शोभा सर्वोच्च में, लहरों और मृगतृष्णा की तरह।

  • सूर्य किरणों के कण गिने जा सकते हैं, पर लोकों की संख्या नहीं।

लोकों का उदय और पतन:

  • सार्वभौमिक आत्मा में लोकों का उदय-पतन, वर्षा में मच्छरों के झुंड की तरह।

  • कब से अस्तित्व में, कितने बीते, कितने शेष अज्ञात।

  • बिना शुरुआत के लुढ़क रहे, समुद्र की लहरों की तरह।

  • बीते हुए के पहले वाले थे, उनके भी पहले वाले।

  • बार-बार उठते और गिरते, समुद्र की लहरों की तरह।

ब्रह्मा के अंडों जैसे सांसारिक लोक:

  • हजारों में बीत जाते हैं, वर्ष के घंटों की तरह।

  • ब्रह्मा के विशाल मन में अनेक ऐसे शरीर घूम रहे हैं।

भविष्य के लोक:

  • दिव्य मन की अनंतता में अनेक और भौतिक लोक विकसित होंगे।

  • समय के साथ वायु में क्षणभंगुर ध्वनियों की तरह गायब हो जाएंगे।

सृष्टि का चक्र:

  • अन्य सृष्टियों में अन्य लोक, मिट्टी से बर्तन और अंकुरों से पत्ते की तरह।

  • तीनों लोकों की महिमा चेतना में दिखती है, जैसे दिव्य मन में।

लोकों का उदय-पतन:

  • न सत्य न पूरी तरह असत्य, मूर्खों की डींग और हवा के ऑर्किड की तरह।

  • सभी चीजें समुद्र की लहरों की तरह, दिखाई देते ही गायब।

  • मन पर प्रभाव डालने वाली चित्रकलाएँ।

संसार एक परिप्रेक्ष्य:

  • सभी चीजें उसमें केवल चित्रकलाएँ, मन के कैनवास के बिना नहीं।

  • कैनवास पर आकृतियों की तरह दर्शाए गए।

  • आत्मा से सृष्टि:

    • दिव्य ज्ञान में विद्वान सृष्टि को ईश्वर की आत्मा से वर्षा की बौछार की तरह मानते हैं।

    • दृश्यमान सृष्टि ईश्वर से उतनी ही अभिन्न है जितनी पृथ्वी से समुद्री जल, या पेड़ से पत्ते और बीज।

  • दिव्य मन से उत्पत्ति:

    • स्थूल या सूक्ष्म रूप में सभी सृजित चीजें दिव्य मन की शून्यता से निकली हैं।

    • बड़े और छोटे रत्नों की माला की तरह एक साथ पिरोए गए।

  • ब्रह्मा की उत्पत्ति के विभिन्न प्रकार (तत्वों से):

    • सूक्ष्म वायु से वातावरण, फिर वायु-जनित ब्रह्मा।

    • वायुमंडलीय वायु से संघनित ब्रह्मा (वायुमंडलीय स्वामी)।

    • प्रकाश से संघनित ब्रह्मा (चमकदार स्वामी)।

    • जल से संघनित ब्रह्मा (जलीय स्वामी)।

    • पृथ्वी के कणों से पार्थिव ब्रह्मा।

    • चार ब्रह्माओं के सार से पांच गुना ब्रह्मा (वर्तमान विश्व की रचना)।

  • अन्य प्राणियों की उत्पत्ति:

    • जल, वायु या गर्मी के संघनन से नर या मादा रूप में प्राणी।

    • मुख, पैर, पीठ और आँखों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।

    • नाभि से कमल और कमल से कमल-जन्मा ब्रह्मा।

  • सृष्टि के विभिन्न सिद्धांत:

    • ये सभी सिद्धांत व्यर्थ सपने, सोते समय के सपनों की तरह झूठे।

    • कल्पना के दिवास्वप्न, पानी की घूमती धाराओं की तरह।

    • इन सिद्धांतों पर आपका क्या विचार है? बच्चों की कहानियों की तरह नहीं लगते?

  • स्वर्ण अंडे से ब्रह्मा:

    • कभी दिव्य मन की शुद्ध शून्यता में उत्पत्ति की कल्पना।

    • इसे सुनहरा और सांसारिक अंडा कहते हैं जिससे अंडा-जन्मा ब्रह्मा का जन्म हुआ।

  • आदि पुरुष और कमल:

    • प्रथम और दिव्य पुरुष जलों में बीज डालता है जिससे कमल उगता है, जिसे महान संसार कहते हैं।

    • यह कमल ब्रह्मा और सूर्य के जन्म का महान गर्भ है।

    • कभी वरुण और वायु देवता इससे पैदा होते हैं, इसलिए अंडज कहलाते हैं।

  • सृष्टि के विभिन्न वृत्तांत:

    • हे राम, ब्रह्मा सृष्टिकर्ता की उत्पत्ति के विभिन्न वृत्तांत हैं।

    • इसी प्रकार इस अ-ठोस और असार सृष्टि के वर्णन भी विभिन्न हैं।

  • पहले बताए गए ब्रह्मा:

    • मैंने तुम्हें इनमें से एक ब्रह्मा की सृष्टि के बारे में पहले ही बता दिया है, और दूसरों की उत्पत्ति का उल्लेख किया है।

  • दिव्य मन का विकास:

    • सभी सहमत हैं कि सृष्टि केवल दिव्य मन का विकास है, यद्यपि मैंने विभिन्न प्रक्रियाएँ बताईं।

  • उत्पत्ति के प्रकार:

    • शुद्ध (सात्विक) और अन्य उत्पादन उसी प्रकार अस्तित्व में आए जैसे मैंने वर्णन किया।

  • संसार में अंतहीन उत्तराधिकार:

    • सृष्टि के बाद विनाश, सुख के बाद दुख, अज्ञान के बाद ज्ञान, बंधन के बाद मुक्ति।

  • चक्र:

    • पिछली रचनाएँ और स्नेह की वस्तुएँ चली गईं, भविष्य में अन्य उठेंगे, दीपकों की तरह।

    • सभी शरीरों का उत्पादन-विनाश ब्रह्मा और दीपकों की तरह।

    • अपने समय में रूप धारण करते हैं, मृत्यु के बाद अविभाज्य द्रव्यमान।

  • युगों का चक्र:

    • सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि युग कुम्हार के पहिये की तरह घूमते हैं।

  • मन्वंतर और कल्प:

    • मन्वंतर और कल्प दिन-रात, सुबह-शाम की तरह एक के बाद एक आते हैं।

  • समय का प्रभुत्व:

    • सभी लोक और चीजें समय के अधीन हैं।

    • बार-बार उत्तराधिकार, बिना चक्रण के कुछ भी नहीं।

  • दिव्य चेतना से उत्पत्ति:

    • सभी अपनी प्रकृति से दिव्य चेतना के निर्वात से निकलते हैं, चिंगारियों की तरह।

  • विलय:

    • एक बार प्रकट होने के बाद सभी दिव्य मन में छिप जाते हैं, मौसम के फल-फूलों की तरह।

  • मन की तरंगें:

    • सभी उत्पादन परम आत्मा के मन की केवल तरंगें।

    • हमारी दृष्टि में दिखना कमजोर आँखों को दो चंद्रमाओं की तरह।

  • चेतना का प्रदर्शन:

    • केवल चेतना ही इन दिखावों को प्रदर्शित करती है।

    • हमेशा चेतना में स्थित, पर बाहर दिखते हैं।

  • संसार की स्थिरता:

    • हे राम, जानो कि संसार कभी अस्तित्व में नहीं है।

    • सर्वोच्च आत्मा की शक्ति का एक स्थिर प्रदर्शन।

    • कभी वैसा नहीं जैसा दिखता, बल्कि बहुत अलग।

    • सर्वशक्तिमान की शक्ति पर निर्भर शो।

  • विद्वानों का निष्कर्ष:

    • विद्वानों का निष्कर्ष वर्तमान तक मान्य: ईश्वर की महान इच्छा के बाद कौन सा संसार है।

    • भविष्य में आने वाला कोई दूसरा संसार नहीं।

  • बुद्धिमानों के लिए ब्रह्म:

    • बुद्धिमानों के लिए यह सब ब्रह्म, संसार जैसी कोई चीज नहीं, अविद्वानों का सिद्धांत।

  • अविद्वानों का भ्रम:

    • अविद्वान संसार को शाश्वत मानते हैं।

    • शाश्वत त्रुटि का प्रभाव संसार की झूठी धारणा बढ़ाता है।

    • पुनर्जन्म का सिद्धांत।

  • विनाश की अनदेखी:

    • चारों ओर सभी चीजों की नश्वर प्रकृति देखकर भी संसार को अविनाशी क्यों मानते हैं?

  • सांख्यों का भ्रम:

    • सूर्य-चंद्र का निरंतर क्रम और पहाड़ों-समुद्रों की स्थिरता देखकर संसार को अविनाशी मानते हैं।

  • दिव्य मन का विस्तार:

    • ऐसा कुछ भी नहीं जो दिव्य मन के विस्तृत विस्तार में निवास न करे।

    • ये केवल मन की अवधारणाएँ हैं, दृश्यमान या अलग अस्तित्व नहीं।

  • पुनरावृत्ति:

    • ये सभी पुनरावृत्ति में दिखाई देते हैं, जन्म-मृत्यु का क्रम भी दोहराया जाता है।

    • सुख-दुख, आराम-कार्य हमेशा एक दूसरे का पीछा करते हैं।

  • सृष्टि का आवर्ती क्रम:

    • यही शून्यता और आकाश के भाग, समुद्र और पहाड़, विभिन्न रंगों के साथ फिर से प्रकट होते हैं।

  • देवताओं और मनुष्यों का आवागमन:

    • देवता और अर्धदेव बार-बार प्रकट होते हैं, सभी लोग बारी-बारी से आते-जाते हैं।

  • बंधन और मुक्ति:

    • बंधन और मुक्ति हमेशा आवर्ती हैं, इंद्र और सोम फिर से प्रकट होते हैं।

  • नारायण और अर्धदेव:

    • नारायण देवता और अर्धदेव बारी-बारी से प्रकट होते हैं।

  • आकाश का चक्रण:

    • आकाश हमेशा अपने शासकों, सूर्य-चंद्र, बादलों-हवाओं के साथ घूमता रहता है।

  • स्वर्ग और पृथ्वी:

    • स्वर्ग और पृथ्वी फिर से कमल के फूल की तरह खुले दिखाई देते हैं।

    • मेरु बीज कोर और सह्या शिखर तंतु के रूप में।

  • सूर्य का मार्ग:

    • सूर्य आकाश के भूलभुलैया में शेर की तरह अपना मार्ग फिर से शुरू करता है।

    • अपनी किरणों से घने अंधकार को नष्ट करता है।

  • चंद्रमा की शोभा:

    • फिर से चलती हुई चंद्रमा को अपनी चमकीली किरणों के साथ फूलों के सफेद तंतुओं के समान चमकते हुए देखें।

    • आकाशीय देवियों के चेहरों को अमृतमयी रोशनी से अभिषेक करते हुए।

  • स्वर्ग का वृक्ष:

    • फिर से स्वर्ग का पवित्र वृक्ष पुण्यात्मा पुरुषों के रेगिस्तानों पर फूल बिखेरता है।

  • समय की उड़ान:

    • फिर से समय की उड़ान को देखें, कर्मों के दो पंखों पर चील की तरह सवार होकर गुजरते हुए।

  • इंद्र का पुनरागमन:

    • एक और इंद्र को प्रकट होते हुए देखें, पिछले इंद्रों के गुजर जाने के बाद।

    • स्वर्ग के कमल जैसे सिंहासन पर अपना स्थान ग्रहण करते हुए।

  • कलि युग का आगमन:

    • फिर से कलि का दुष्ट युग सत्य युग को दूषित करने के लिए प्रकट होता है।

  • समय का चक्र:

    • समय कुम्हार की तरह पृथ्वी की थाली बनाता है, लगातार पहिया घुमाकर सृष्टि के चक्र लाता है।

  • समय का प्रभाव:

    • अनुभवी समय सृष्टि की ताजगी को मुरझा देता है।

  • सूर्य का प्रलयकारी रूप:

    • बारह राशि चक्र के सूर्य एक साथ उगकर सृष्टि को जला देते हैं।

  • बादलों की वर्षा:

    • पुष्कर और आवर्तक बादल वर्षा करते हैं, पहाड़ों को जलमग्न करते हैं।

  • जल का विलय और शून्यता:

    • पानी कम होने और हवा बंद होने के बाद संसार विशाल निर्वात दिखता है।

  • पुनः प्राणियों का आगमन:

    • फिर जीवित प्राणी पृथ्वी को भरते हैं और कुछ वर्षों तक भोजन करते हैं।

  • दिव्य मन की अन्य रचनाएँ:

    • फिर अन्य समय में दिव्य मन अन्य रचनाएँ फैलाता है।

  • सृष्टि और प्रलय का चक्र:

    • फिर सृष्टि दिखती है और फिर बाढ़ के पानी में डूब जाती है।

  • संसार की अस्थिरता:

    • हे राम, विचार करो कि इस क्रांतिकारी संसार में किसी भी चीज की कोई स्थिरता है या नहीं।

  • भ्रम का भूलभुलैया:

    • संसार का क्रांति दासुर के मन के मतिभ्रम जैसा है।

    • बिना किसी ठोसता की कल्पना।

  • अवास्तविकता:

    • इतना व्यापक और घनी आबादी वाला दिखने वाला संसार केवल एक काल्पनिक अवास्तविकता है।

    • अज्ञान से वास्तविक दिखने पर भी अवास्तविकता से बना है और भरोसे के लायक नहीं है।

c. व्याख्या

यह अध्याय सृष्टि की विविधता, असंख्य लोकों के अस्तित्व और समय के चक्रीय स्वभाव का विस्तृत वर्णन करता है। वसिष्ठ राम को बताते हैं कि अनगिनत ब्रह्मा, शिव, इंद्र और नारायण पहले भी हो चुके हैं और भविष्य में भी होंगे। विभिन्न लोकों में प्राणियों के रीति-रिवाज और स्वरूप भिन्न-भिन्न हैं, और सृष्टि की प्रक्रिया जादू के खेल की तरह अद्भुत है।

वसिष्ठ देवताओं की उत्पत्ति के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करते हैं, जो विभिन्न तत्वों (वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी) से और विभिन्न तरीकों से (अंडज, कमल-जन्मा) उत्पन्न होते हैं। वे पृथ्वी के विभिन्न स्वरूपों और ब्रह्मांड में मौजूद अद्भुत लोकों का वर्णन करते हैं, जिनमें से कुछ चमकदार हैं और कुछ की रोशनी हम तक नहीं पहुँची है।

अध्याय लोकों की संख्या की असीम प्रकृति पर जोर देता है, जो ब्रह्मा के सार के निर्वात में समुद्र की लहरों की तरह बिखरे हुए हैं और सार्वभौमिक आत्मा में उठते और गिरते हैं। लोकों का उदय और पतन एक अंतहीन चक्र है, जैसे वर्ष के घंटे और ऋतुएँ बदलती रहती हैं।

वसिष्ठ विभिन्न दार्शनिक मतों के अनुसार सृष्टि के सिद्धांतों का उल्लेख करते हैं, लेकिन अंततः यह स्थापित करते हैं कि सृष्टि दिव्य मन का ही विकास है। वे सृष्टि और प्रलय के चक्रीय स्वभाव का वर्णन करते हैं, जिसमें युग, मन्वंतर और कल्प एक के बाद एक आते हैं।

अध्याय इस विचार पर बल देता है कि संसार स्थिर नहीं है, बल्कि लगातार परिवर्तनशील है। यह दिव्य चेतना से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है, जैसे चिंगारियाँ आग से निकलती हैं और फिर उसमें समा जाती हैं। संसार का दिखना कमजोर आँखों को दो चंद्रमाओं के दिखने जैसा भ्रम है।

वसिष्ठ बुद्धिमानों के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं, जो संसार को ब्रह्म से अभिन्न मानते हैं, जबकि अविद्वान इसे शाश्वत मानते हैं। वे संसार की अस्थिर और भ्रामक प्रकृति पर जोर देते हैं, जो दासुर के मन के मतिभ्रम के समान है। अंततः, अध्याय संसार की अवास्तविकता और परिवर्तनशीलता को स्थापित करते हुए, आध्यात्मिक ज्ञान के महत्व को दर्शाता है।

दासुर की कहानी

अध्याय 48 - उसे वृक्ष की चोटी पर रहने का अग्नि का वरदान प्राप्त होता है

  • सांसारिक पुरुषों की अज्ञानता:

    • सांसारिक गतिविधियों में लिप्त, धन-भोग की इच्छाओं से विकृत बुद्धि वाले सत्य नहीं जान सकते।

  • सत्य का ज्ञान:

    • जिसने समझ विकसित की, इंद्रियाँ वश में की, वही संसार की त्रुटियाँ जान सकता है।

  • अहंकार का त्याग:

    • संसार की त्रुटियाँ देखने वाला अहंकार का भ्रम त्याग देता है, जैसे साँप केंचुल।

  • पुनर्जन्म से मुक्ति:

    • स्वार्थ से अनजान होने पर पुनर्जन्म नहीं होता, भुने बीज की तरह जो अंकुरित नहीं होता।

  • शरीर का मोह:

    • अज्ञानी शरीर के संरक्षण के लिए कष्ट उठाते हैं, जो रोग-खतरों से ग्रस्त और नश्वर है।

  • आत्मा का कल्याण:

    • हे राम, अज्ञानी की तरह शरीर की परवाह न करो, केवल आत्मा के कल्याण का ध्यान रखो।

  • राम का प्रश्न:

    • दासुर की कहानी सुनाइए जो ब्रह्मांड के स्वप्निल और खोखले रूप को दर्शाती है।

  • वसिष्ठ का उत्तर:

    • दासुर की कहानी संसार के भ्रामक रूप का दृष्टांत है, जो मन का हवाई महल है।

  • मगध प्रदेश:

    • इस भूमि पर मगध का महान और समृद्ध प्रांत, फूलों के पेड़ों से भरा।

  • कदंब वन:

    • विस्तृत कदंब कुंजों का वन, आकर्षक पक्षियों का क्रीड़ास्थल।

  • प्राकृतिक सौंदर्य:

    • खेत अनाज से भरे, किनारे कुंजों से, धारा किनारे कमल से भरे।

    • कुंजों में ग्रामीण लड़कियों के गीत, मैदान फूलों से सजे।

  • एकांत स्थान:

    • पर्वत की तलहटी में कर्णिकार फूलों, केले-कदंब से घिरा, काई-झाड़ियों से भरा एकांत स्थान।

    • लाल फूलों की धूल से छिड़का, जलपक्षियों और सारसों के कलरव से गुंजायमान।

  • पवित्र पहाड़ी और कदंब वृक्ष:

    • उस स्थान पर एक पवित्र पहाड़ी, उस पर पक्षियों से भरा कदंब वृक्ष।

  • दासुर ऋषि:

    • उस पर महान तपस्या के पवित्र ऋषि दासुर निवास करते थे।

    • कदंब की शाखा पर वासना रहित होकर तपस्या में लीन।

  • राम का प्रश्न:

    • वह तपस्वी वन में कहाँ से और कैसे आया, और पेड़ पर क्यों बैठा था?

  • वसिष्ठ का उत्तर:

    • उनके पिता प्रसिद्ध ऋषि शरलोमा थे, उसी पर्वत पर ब्रह्मा समान ध्यान में लीन।

  • दासुर का जन्म:

    • बृहस्पति के पुत्र कच की तरह दासुर शरलोमा के एकमात्र पुत्र थे।

    • बचपन से पिता के साथ वन में निवास।

  • शरलोमा का देहांत:

    • शरलोमा ने अनेक वर्ष बिताए, फिर शरीर त्यागकर स्वर्ग चले गए।

  • दासुर का विलाप:

    • अकेले रह जाने पर दासुर ने पिता के वियोग में फूट-फूट कर विलाप किया।

  • शोक और वैराग्य:

    • माता-पिता से वंचित होकर दुख से भरे, सर्दी में कमल की तरह मुरझाने लगे।

  • वन देवता का आगमन:

    • वन देवता ने दया करके अदृश्य रूप से आकर श्रव्य स्वर में कहा।

  • वन देवता का उपदेश:

    • हे ऋषि पुत्र, अज्ञानी की तरह क्यों रोते हो? सांसारिक अस्थिरता जानकर निराश क्यों?

    • संसार में सब अस्थिर, प्रकृति का नियम जन्म-जीवन-नाश।

    • ब्रह्मा से लेकर नीच वस्तु तक सब नष्ट होने वाले।

    • पिता की मृत्यु पर विलाप मत करो, उदय-पतन जानो।

  • दासुर का मौन:

    • श्रव्य वाणी सुनकर दासुर ने आँसू पोंछे और मौन धारण किया।

  • अंतिम संस्कार और तपस्या:

    • पिता के अंतिम संस्कार किए, स्थिर भक्ति में मन लगाया।

    • ब्राह्मण धर्मानुसार तपस्या, वैदिक अनुष्ठानों का निर्वहन।

  • ज्ञान की कमी:

    • जानने योग्य (ब्रह्म) को न जानने से मन को शांति नहीं मिली।

    • पृथ्वी पवित्र होने पर भी पवित्रता नहीं मिली।

  • वृक्ष पर बैठने का संकल्प:

    • पृथ्वी को दूषित मानकर वृक्ष की शाखा पर बैठने का व्रत लिया।

    • वृक्षों पर तपस्या और पक्षियों की तरह विश्राम का विचार।

  • अग्नि की उपासना:

    • ऊँचे बैठकर नीचे आग जलाई और कंधे के मांस की आहुति देने लगे।

  • अग्नि देवता का विचार:

    • अग्नि ने सोचा कि अग्नि देवताओं का मुख है, ब्राह्मण मांस की आहुति देवताओं के मुख जला देगी।

  • अग्नि देवता का प्रकटीकरण:

    • ऐसा सोचकर अग्नि देवता पूर्ण तेज में प्रकट हुए।

  • अग्नि देवता का वरदान:

    • अग्नि ने कहा, हे युवा ब्राह्मण, मुझसे अपना वांछित वरदान स्वीकार करो।

  • दासुर की स्तुति:

    • ब्राह्मण लड़के ने स्तुतिपूर्ण भजन से उन्हें प्रणाम किया।

  • दासुर की प्रार्थना:

    • हे प्रभु, पृथ्वी पर कोई पवित्र स्थान नहीं, यह पापियों से भरी है।

    • प्रार्थना है कि पेड़ों की चोटियाँ ही मेरे रहने के स्थान हों।

  • अग्नि का वरदान:

    • ब्राह्मण लड़के के पूछने पर देवता ने कहा, “ऐसा ही हो,” और गायब हो गए।

  • वरदान की प्राप्ति:

    • देवता के गायब होने पर ऋषि पुत्र अपने वांछित वरदान से संतुष्ट हुए।

    • उनका चेहरा पूर्णिमा की तरह चमक उठा।

  • प्रसन्नता:

    • इच्छा की सफलता से प्रसन्न, उनका मुख मुस्कान से खिल उठा।

c. व्याख्या

यह अध्याय दासुर नामक एक तपस्वी की कहानी कहता है, जो संसार की क्षणभंगुरता और पवित्रता की खोज में एक असामान्य मार्ग अपनाता है। वसिष्ठ इस कथा के माध्यम से सांसारिक आसक्ति की व्यर्थता और आत्मज्ञान के महत्व को दर्शाते हैं।

कहानी की शुरुआत में वसिष्ठ सांसारिक पुरुषों की अज्ञानता पर प्रकाश डालते हैं जो धन और भोगों की इच्छाओं में उलझे रहने के कारण सत्य को नहीं जान पाते। केवल वही व्यक्ति सत्य को समझ सकता है जिसने अपनी इंद्रियों को वश में किया है और सांसारिक भ्रमों को पहचाना है।

राम दासुर की कहानी जानने की इच्छा व्यक्त करते हैं, जिसे वसिष्ठ संसार की अवास्तविकता और खोखलेपन के दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत करते हैं। मगध प्रदेश और कदंब वन का सुंदर वर्णन सांसारिक आकर्षणों को दर्शाता है, लेकिन कहानी का केंद्र दासुर ऋषि हैं जो इन आकर्षणों से विरक्त होकर तपस्या में लीन हैं।

दासुर के वन में आने और वृक्ष पर बैठने का कारण उनके पिता शरलोमा की मृत्यु और सांसारिक अपवित्रता की उनकी धारणा है। अपने माता-पिता के वियोग में दुखी दासुर को वन देवता उपदेश देते हैं कि संसार में सब कुछ नश्वर है और मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है।

हालांकि, दासुर का ज्ञान अपूर्ण है। वे पृथ्वी को अपवित्र मानते हैं और इसलिए वृक्ष की शाखा पर बैठकर तपस्या करने का संकल्प लेते हैं। उनकी तपस्या का असामान्य तरीका - आग जलाकर अपने मांस की आहुति देना - उनकी अज्ञानता और भ्रम को दर्शाता है।

अग्नि देवता का हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है। वे दासुर को उनके असामान्य कृत्य से रोकते हैं और उन्हें वरदान देते हैं कि वे पेड़ों की चोटियों पर निवास कर सकें। दासुर का यह वरदान प्राप्त करना उनके अज्ञान और अपूर्ण ज्ञान का प्रतीक है, क्योंकि वे अभी भी सांसारिक अपवित्रता से बचने की कोशिश कर रहे हैं बजाय इसके कि वे सर्वव्यापी ब्रह्म के ज्ञान को प्राप्त करें।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सत्य का ज्ञान तभी प्राप्त हो सकता है जब हम सांसारिक आसक्तियों और भ्रमों से मुक्त हों और सर्वव्यापी ब्रह्म के ज्ञान को प्राप्त करें। दासुर की कहानी एक चेतावनी है कि बाहरी कर्म और तपस्या अकेले मुक्ति नहीं दिला सकते, जब तक कि आंतरिक ज्ञान और वैराग्य न हो।

अध्याय 49 - दासुर के कदंब वन का रेखांश और व्याख्या

b. रेखांश

  • वन का विस्तार और स्वरूप:

    • बादलों तक फैला, मध्याह्न सूर्य के घोड़ों का विश्राम स्थल।

    • दूर तक फैली शाखाएँ, स्वर्ग की छत के नीचे चंदवा।

    • खिले फूलों की आँखों से चारों ओर आकाश की ओर देखता।

  • वायु और सुगंध:

    • कोमल हवाएँ सुगंधित धूल बिखेरती, मधुमक्खियों से जड़े गुच्छे।

    • पत्ते हथेलियों की तरह लहराते, परियों के आकाश को स्पर्श करते।

  • किनारों की सुंदरता:

    • झाड़दार किनारे और लाल तंतुओं वाले सफेद फूल, पान के पत्तों से रंगे दांतों वाली सुंदरियों की तरह मुस्कुराते।

  • लताओं का नृत्य:

    • लताएँ आनंद से नाचतीं, फूलों के पिस्टिल से धूल बिखेरतीं, पूर्णिमा की चमक से चमकतीं।

  • पृथ्वी का सौंदर्य:

    • घनी झाड़ियाँ, चहचहाते चकोर, तारों से जड़े स्वर्ग के दूधिया मार्ग की तरह।

  • मोरों का झुंड:

    • शाखाओं पर बैठे मोर, बहु-रंगीन पूंछें, हरे पत्तों में इंद्रधनुष की तरह, नीले आकाश में नीले बादल।

  • हिरणों का दृश्य:

    • आधे छिपे सफेद हिरण, बाहर निकले अगले भाग, आकाश में काले-उजले पक्षों वाले चंद्रमाओं की तरह।

  • पक्षियों का संगीत:

    • चातक, कोयल और चकोर का कलरव, कुंजों में निरंतर सामंजस्य।

  • बगुले:

    • घोंसलों पर बैठे सफेद बगुले, स्वर्ग में शांत बैठे सिद्ध-मास्टर हवाई प्राणियों की तरह।

  • लहराती लताएँ:

    • लाल पत्तों वाली लहराती लताएँ, मधुमक्खियों से घिरे फूल, गुलाबी हथेलियाँ फड़फड़ाती अप्सराओं की तरह।

  • कमल:

    • आकाश-नीले पानी पर घूमते नीले कमल, पीले तंतु, सुनहरी धूल, इंद्रधनुष और बिजली की चमक की तरह।

  • वन की शाखाएँ:

    • हजारों उठी शाखाएँ, विश्वरूप भगवान की हजार भुजाओं की तरह, हवा में नाचतीं, सूर्य-चंद्र झुमकों की तरह लटके।

  • हाथी और तारे:

    • शाखाओं के नीचे हाथी, ऊपर चमकते तारे, नीचे काले बादल, ऊपर चमकते तारों वाले आकाश की तरह वन।

  • वन का भंडार:

    • सभी प्रकार के फलों और फूलों का गोदाम, ब्रह्मा की तरह सभी उत्पादन का भंडार।

  • भूमि की चमक:

    • गिरते छोटे फूलों और पराग की धूल से चमकती भूमि, आकाश सौर और तारकीय प्रकाश से चमकता।

  • पक्षियों का झुंड:

    • पेड़ों पर उड़ते पक्षी, घोंसलों के चारों ओर फड़फड़ाते, जमीन पर चरते पक्षी, ऊपर-नीचे लोगों वाले शहर की तरह वन।

  • मंडप:

    • मंडप घरों के भीतरी कमरों की तरह, लहराते फूल झंडों की तरह, फूलों की धूल से बिखरे, खिड़कियों पर लटके फूल।

  • ध्वनियों का सामंजस्य:

    • मधुमक्खियों और भृंगों की गुंजन, चकोर और तोते की चहचहाहट, कोकिलाओं की कूक, खिड़कियों से निकलती गायिकाओं के संगीत की तरह।

  • वन देवियों के अतिथि:

    • विभिन्न प्रकार के पक्षी वन देवियों के आवरणों के चारों ओर मंडराते, उनके एकांतवास के एकमात्र अतिथि।

  • मधुमक्खियों की गुंजन:

    • मधुमक्खियाँ लगातार फूलों के पिस्टिल पर गुनगुना रही थीं।

  • झरनों की ध्वनि:

    • झरनों की आवाज पास की ऊँची पहाड़ियों से लगातार फैलती रहती है।

  • हवा और बादल:

    • कोमल गर्म हवाएँ लहराते फूलों से खेलतीं, सफेद बादल ऊँचे पेड़ों को ढँकते, पहाड़ों की चोटियों की तरह।

  • मजबूत वृक्ष:

    • ऊँचे पहाड़ों के समान मजबूत वृक्ष, हाथियों के गालों से रगड़े, अचल खड़े, विशाल पैरों से टकराने पर भी।

  • पक्षियों की विविधता:

    • पेड़ों के खोखलों में रहने वाले बहु-रंगीन पक्षी विष्णु के व्यक्ति में रहने वाली विभिन्न जातियों के प्राणियों की तरह।

  • पत्तियों की गति:

    • चित्रित पत्तियों की हरकतों से, हथेलियों की उंगलियों की तरह, पेड़ नाचती लताओं के साथ तालमेल बिठाते।

  • वृक्षों का आनंद:

    • शाखादार भुजाओं और लताओं के आलिंगन से आनंद से नाचते, सभी प्राणियों को पोषण देने के बारे में सोचते।

  • आश्रय:

    • हजारों लतादार पौधों का सहारा, जो उनके चारों ओर लिपटी हैं, मधुमक्खियों की भिनभिनाहट के साथ आनंदमय ध्वनि गाते हैं।

  • हवाई स्वामी:

    • पेड़ों से फूल गिराने वाले दयालु हवाई स्वामी, मधुमक्खियों और कोयल द्वारा आनंदमय स्वरों से सराहे गए।

  • कदंब का उपहास:

    • कदंब के खिलते फूल वन के किनारे के फूलहीन पेड़ों का उपहास करते हुए हँसते हुए लगते हैं।

  • कदंब की चुनौती:

    • आकाश तक ऊँचा सिर और उड़ते पक्षी बालों की तरह, कदंब इंद्र के स्वर्ग के पारिजात को चुनौती देता हुआ लगता है।

  • मधुमक्खियों का झुंड:

    • कदंब के चारों ओर झुंड करती मधुमक्खियाँ हजार आँखों वाले इंद्र की तरह दिखती हैं, जिससे वह प्रतिस्पर्धा करता है।

  • फूलों का गुच्छा:

    • पेड़ के सिर पर फूलों का गुच्छा, रत्नों से सजे साँप के फन की तरह, मानो नरक का साँप स्वर्ग देखने आया हो।

  • शिव का रूप:

    • फूलों के पराग से सना पेड़, राख से अभिषेकित शिव की तरह, छायादार निवास स्थान रसीले फलों से भरा, यात्रियों को तरोताजा करता।

  • नंदन वन:

    • कदंब का पेड़ स्वर्ग के नंदन वन की तरह, घनी शाखाओं के नीचे आले, फूलों की लताओं से बनी गुफाएँ, स्वर्ग के पक्षी स्थायी निवासियों की तरह मंडराते।

c. व्याख्या

यह अध्याय दासुर के निवास स्थान, कदंब वन की भव्यता और सुंदरता का विस्तृत और काव्यात्मक वर्णन करता है। वसिष्ठ इस वन को एक जादुई और दिव्य स्थान के रूप में चित्रित करते हैं, जो प्रकृति के सभी अद्भुत तत्वों से परिपूर्ण है। यह केवल एक भौतिक स्थान नहीं है, बल्कि एक ऐसा क्षेत्र है जो आध्यात्मिक और अलौकिक गुणों से संपन्न है।

वन का विस्तार बादलों तक पहुँचता है, जो इसकी विशालता और ऊँचाई को दर्शाता है। इसकी शाखाएँ स्वर्ग की छत के नीचे एक विशाल मंडप बनाती हैं, जो इसे एक आश्रय और सुरक्षा का स्थान बनाती हैं। खिले हुए फूल 'आँखों' के रूपक के रूप में उपयोग किए जाते हैं, जो वन को एक सजीव और जागरूक इकाई के रूप में दर्शाते हैं जो चारों ओर देख रही है।

वायु सुगंधित धूल बिखेरती है, जो वन की पवित्रता और आकर्षण को बढ़ाती है। मधुमक्खियों और पक्षियों की उपस्थिति वन को जीवंत और गतिशील बनाती है। विभिन्न प्रकार के पेड़, लताएँ और फूल रंगों और बनावटों का एक समृद्ध मिश्रण बनाते हैं, जो इसे एक दृश्यमान रूप से मनोरम स्थान बनाते हैं।

वन में विभिन्न प्रकार के प्राणियों का वर्णन किया गया है - मोर, हिरण, विभिन्न प्रकार के पक्षी - जो सभी सद्भाव और शांति में रहते हैं। इन प्राणियों की उपस्थिति वन को एक जीवंत और प्राकृतिक अभयारण्य के रूप में दर्शाती है।

ध्वनियों का वर्णन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पक्षियों का मधुर कलरव, मधुमक्खियों की गुंजन, और झरनों की आवाज वन को एक संगीतमय और शांत वातावरण प्रदान करती है। यह ध्वनियाँ प्रकृति की अंतर्निहित लय और सद्भाव को दर्शाती हैं।

वसिष्ठ वन की सुंदरता की तुलना विभिन्न दिव्य छवियों और अवधारणाओं से करते हैं। मोरों की तुलना इंद्रधनुष से, हिरणों की चंद्रमा से, और वन की शाखाओं की विश्वरूप भगवान की भुजाओं से की जाती है। यह तुलना वन को एक लौकिक और आध्यात्मिक महत्व प्रदान करती है।

कदंब के पेड़ को विशेष महत्व दिया गया है। इसे न केवल वन का एक प्रमुख तत्व बताया गया है, बल्कि इसे इंद्र के स्वर्ग के पारिजात वृक्ष को चुनौती देने वाले और भगवान शिव के समान पवित्रता रखने वाले के रूप में भी चित्रित किया गया है। यह पेड़ दासुर के आध्यात्मिक अभ्यास के केंद्र के रूप में कार्य करता है और वन की समग्र पवित्रता में योगदान देता है।

अंततः, यह अध्याय प्रकृति की सुंदरता और दिव्यता का एक शक्तिशाली चित्रण है। दासुर का कदंब वन एक ऐसा स्थान है जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक जगत आपस में मिलते हैं, और यह तपस्या, शांति और प्रकृति के साथ सद्भाव का प्रतीक है। यह वर्णन हमें प्रकृति के प्रति श्रद्धा और उसके भीतर छिपी दिव्यता को पहचानने के लिए प्रेरित करता है।

अध्याय 50 - दासुर का स्वर्ग का सर्वेक्षण - रेखांश और व्याख्या

b. रेखांश

  • दासुर का निवास:

    • फूलों के पहाड़ पर रहने जैसा अनुभव।

    • मन में वसंत और फलों का आनंद।

  • उच्च स्थान:

    • ऊँचे और हवादार वृक्ष की चोटी पर बैठे।

    • भगवान विष्णु की तरह लोकों का सर्वेक्षण।

  • तपस्या:

    • आकाश तक पहुँची शाखा पर भय और इच्छा से रहित तपस्या।

  • प्रकृति का अवलोकन:

    • पत्तों के आरामदायक बिस्तर से प्रकृति के अजूबों को देखना।

  • विभिन्न दृश्य:

    • दूरी पर सोने के हार जैसी चमकती नदी।

    • पृथ्वी के वक्ष पर निप्पलों जैसी दूर की पहाड़ियों की चोटियाँ।

    • बादल के नीले घूंघट में ढका परी के चेहरे जैसा आकाश।

    • परी के हरे वस्त्र जैसी पेड़ों की हरी पत्तियाँ।

    • उसके सिर पर मालाओं जैसे फूलों के गुच्छे।

    • पानी के बर्तनों जैसे दूर के झीलें, जलीय पौधों और फूलों से सजे।

  • संवेदनाओं का मानवीकरण:

    • खिलते कमलों की सुगंध परी की मीठी सांस।

    • झरनों की गड़गड़ाहट उसके पैरों में बंधे गहने।

    • आकाश को छूते पेड़ उसके शरीर के बाल।

    • घने जंगल उसकी जांघें।

    • सूर्य और चंद्रमा के गोले उसके कानों के झुमके।

    • अनाज के खेत उसके चंदन के लेप की बिंदियाँ।

    • बादलों से ढकी पहाड़ियाँ उसके वक्ष।

    • चमकते पानी वाले समुद्र उसके दर्पण।

    • मौसम के फल और फूल उसकी चोली पर कढ़ाई।

    • सूर्य और चंद्रमा की किरणें उसके शरीर पर पाउडर या चंदन का लेप।

    • परिदृश्य को ढकने वाले बादल उसके वस्त्र।

    • वन के किनारों पर पेड़ और पौधे उसकी पोशाक के किनारे।

  • निष्कर्ष:

    • इस प्रकार उन्होंने स्वर्ग के सभी दस दिशाओं को एक परी रानी के रूप से भरा हुआ देखा।

c. व्याख्या

इस अध्याय में, वसिष्ठ दासुर के कदंब वन में रहने के बाद स्वर्ग के विशाल परिदृश्य का अवलोकन करने का वर्णन करते हैं। दासुर, जो वृक्ष की चोटी पर बैठे हैं, प्रकृति के विभिन्न तत्वों को एक विशाल और सुंदर परी रानी के रूपक के माध्यम से देखते हैं। यह वर्णन न केवल प्रकृति की सुंदरता को दर्शाता है बल्कि दासुर की कल्पनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि को भी उजागर करता है।

दासुर का अनुभव एक गहन आंतरिक आनंद से भरा है, जैसे वह फूलों के पहाड़ पर रह रहे हों। वृक्ष की चोटी पर उनका स्थान उन्हें एक ऊंचा दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिससे वे भगवान विष्णु की तरह सभी लोकों का सर्वेक्षण कर सकते हैं। उनकी तपस्या भय और इच्छा से रहित है, जो उनकी बढ़ती हुई आध्यात्मिक परिपक्वता को दर्शाता है।

प्रकृति के विभिन्न तत्वों का मानवीकरण इस अध्याय की एक प्रमुख विशेषता है। नदी को सोने के हार के रूप में, पहाड़ियों को पृथ्वी के वक्ष पर निप्पलों के रूप में, और आकाश को नीले घूंघट में ढकी परी के चेहरे के रूप में देखना, दासुर की काव्यात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि को दर्शाता है। पेड़ों की पत्तियाँ परी के वस्त्र हैं, फूल मालाएँ हैं, और झीलें पानी के बर्तन हैं।

संवेदनाओं को भी मानवीकृत किया गया है। खिलते कमलों की सुगंध परी की मीठी सांस है, और झरनों की गड़गड़ाहट उसके पैरों में बंधे गहनों की ध्वनि है। यह संवेदी विवरण प्रकृति को एक जीवंत और सांस लेने वाली इकाई के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

आकाश, पृथ्वी और समुद्र के विभिन्न पहलुओं की तुलना परी रानी के शरीर और वस्त्रों से की जाती है। सूर्य और चंद्रमा उसके झुमके हैं, अनाज के खेत चंदन के लेप की बिंदियाँ हैं, और बादल उसके वक्षों को ढकने वाले वस्त्र हैं। यह विस्तृत रूपक स्वर्ग के विशाल विस्तार और पृथ्वी की सुंदरता को एक एकीकृत और सामंजस्यपूर्ण दृश्य में बांधता है।

अंततः, दासुर स्वर्ग के सभी दस दिशाओं को इस विशाल और सुंदर परी रानी के रूप में देखते हैं, जो प्रकृति की सर्वव्यापी और दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है। यह अध्याय दासुर की आध्यात्मिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है, जहाँ वे बाहरी दुनिया में आंतरिक दिव्यता को देखने लगते हैं।

अध्याय 51 - दासुर को एक पुत्र प्राप्त होता है 

  • दासुर का तपस्या स्थल:

    • वन में आश्रम, कदंब दासुर के रूप में ज्ञात, कठोर तपस्या के विशालकाय।

  • ध्यान:

    • लता के पत्तों पर बैठकर स्वर्ग की ओर देखना।

    • पद्मासन में बैठकर मन को भीतर बुलाना।

  • मानसिक यज्ञ:

    • आध्यात्मिक आराधना और औपचारिक अनुष्ठान से अपरिचित।

    • फल की इच्छा से मानसिक यज्ञ करना शुरू।

    • हवाई आसन पर बैठकर आंतरिक आत्मा और मन से पवित्र अग्नि और अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान करना।

  • तपस्या का काल:

    • दस वर्षों तक मानसिक यज्ञों (बैल, घोड़ा, मानव बलि) से देवताओं को संतुष्ट करना, मन में उनके पुरस्कार।

  • आत्मा का ज्ञान:

    • समय के साथ मन शुद्ध और विस्तारित हुआ, आत्मा की मुक्ति का ज्ञान प्राप्त हुआ।

    • अज्ञान दूर हुआ, हृदय सांसारिक इच्छाओं की गंदगी से शुद्ध हुआ।

  • वन देवी का दर्शन:

    • पत्तेदार और काईदार आसन के पास एक वन देवी को खड़े देखा।

    • प्रकाश का शरीर, फूलों की पोशाक पहने।

    • सुंदर रूप और चेहरा, बड़ी चमकीली आँखें उत्सुकता से उसकी ओर मुड़ीं।

    • नीले कमल की सुगंध, आकृति ने अंतरतम आत्मा को मोहित किया।

  • देवी से वार्तालाप:

    • दासुर का देवी से प्रश्न: तुम कौन हो, हे कोमल महिला? कामदेव को चुनौती देती हो। वन अप्सरा की तरह क्यों खड़ी हो?

    • देवी का उत्तर: वन देवी हूँ। चैत्र मास की तेरहवीं को उत्सव देखने आई थी। अपनी निःसंतानता से दुखी थी। आपसे पुत्र प्राप्त करने आई हूँ। पुत्र उत्पन्न करें अन्यथा शरीर त्याग दूंगी।

  • दासुर का वरदान:

    • दासुर का मुस्कुराना, फूल देना और कोमल वचन: एक महीने तक शिव की पूजा करो, फिर सुंदर पुत्र जन्म दोगी। वह पुत्र मेरे जैसा तपस्वी और द्रष्टा बनेगा।

  • देवी का प्रस्थान:

    • देवी प्रसन्न होकर चली गई, आशीर्वाद के लिए आवश्यक कार्य करने का वादा किया।

  • पुत्र का जन्म और प्रशिक्षण:

    • तपस्वी ने महीने, ऋतुएँ और वर्ष ध्यान में बिताए।

    • लंबे समय बाद देवी पुत्र (भव्य) के साथ लौटी, बारह वर्ष का हो गया था।

    • प्रणाम किया और पुत्र के साथ बैठी।

    • पुत्र को सभी विद्याओं में प्रशिक्षित किया, केवल मोक्ष के ज्ञान में अशिक्षित।

  • मोक्ष का ज्ञान:

    • देवी की प्रार्थना: हे स्वामी, इसे उस ज्ञान का उपदेश दें।

    • दासुर का उत्तर: बच्चे को छोड़कर जाओ।

  • पुत्र का अध्ययन:

    • देवी के जाने के बाद पुत्र पिता के प्रति विनम्र रहा और छात्र के रूप में उनके पास रहा।

    • तपस्या का अभ्यस्त, पिता के व्याख्यानों से सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त करता रहा।

    • पिता के साथ लंबा समय बिताया।

    • विभिन्न कथाओं, उदाहरणों, ऐतिहासिक वृत्तांतों और वेदों-वेदांत के प्रमाणों से शिक्षा प्राप्त की।

  • ज्ञान की प्राप्ति:

    • पुत्र बिना किसी चिंता के पिता के पाठों में उपस्थित रहा।

    • शिक्षा के माध्यम से चीजों की सही धारणाएँ बनाईं।

    • पिता ने सही तर्क और सही शब्दविन्यास के माध्यम से पुत्र के मन में सच्चा ज्ञान भरा।

c. व्याख्या

यह अध्याय दासुर की आध्यात्मिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है जब उन्हें एक वन देवी से पुत्र प्राप्त होता है और वे उसे आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं। यह अध्याय सांसारिक इच्छाओं, दिव्य कृपा और गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को उजागर करता है।

दासुर का दस वर्षों तक कठोर मानसिक यज्ञ करना उनकी आध्यात्मिक साधना की गहराई को दर्शाता है। फल की इच्छा से किए गए इन यज्ञों के परिणामस्वरूप उनका मन शुद्ध होता है और उन्हें आत्मा के ज्ञान की प्राप्ति होती है। सांसारिक इच्छाओं से मुक्ति उन्हें एक वन देवी के दर्शन के योग्य बनाती है।

वन देवी का प्रकट होना और पुत्र की कामना करना दैवीय हस्तक्षेप का प्रतीक है। देवी का सुंदर रूप और दासुर के प्रति उनकी उत्सुकता सांसारिक आकर्षणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन दासुर का प्रतिक्रिया संयमित और आध्यात्मिक रूप से केंद्रित है।

दासुर द्वारा देवी को पुत्र प्राप्ति का वरदान देना और यह भविष्यवाणी करना कि वह पुत्र उनके जैसा तपस्वी और द्रष्टा बनेगा, कर्म और भाग्य के परस्पर क्रिया को दर्शाता है। देवी का शिव की पूजा करना और पुत्र का जन्म दैवीय इच्छा और व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम है।

पुत्र भव्य का प्रशिक्षण महत्वपूर्ण है। उसे सभी सांसारिक विद्याओं में निपुण बनाया जाता है, लेकिन उसकी शिक्षा तब तक अधूरी रहती है जब तक उसे मोक्ष का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। यह ज्ञान उसे उसके पिता द्वारा प्रदान किया जाता है, जो गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को दर्शाता है।

दासुर का अपने पुत्र को सही तर्क, सही शब्दविन्यास और वेदों-वेदांत के ज्ञान से शिक्षित करना आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने की उचित विधि को दर्शाता है। जिस प्रकार बादल अपनी कर्कश ध्वनि से मोर को आने वाली वर्षा का संकेत देता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को गहन ज्ञान सरल और प्रभावी तरीके से प्रदान करते हैं।

अंततः, यह अध्याय सांसारिक जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर देता है। दासुर का पुत्र सांसारिक विद्याओं में निपुण होने के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी प्राप्त करता है, जो एक पूर्ण और सार्थक जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। यह अध्याय दैवीय कृपा, गुरु का मार्गदर्शन और शिष्य की निष्ठा के महत्व को भी दर्शाता है जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं।