Monday, June 30, 2025

जगत क्या है?


योग वशिष्ठ के अनुसार, रामजी ने मुनिवर वशिष्ठजी से जगत (विश्व) के स्वरूप, उसकी उत्पत्ति और उसके लीन होने के संबंध में गहन प्रश्न पूछे हैं, जैसे कि "यह जगत क्या है?" और "इसकी उत्पत्ति कैसे हुई?"। इन प्रश्नों के उत्तर में, वशिष्ठजी बताते हैं कि जगत का निर्माण मन, चित्शक्ति (चेतना की शक्ति), संकल्प और वासनाओं से होता है, और यह वास्तव में ब्रह्म का ही एक आभास है।

मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • जगत का मूल स्वरूप (The Fundamental Nature of the World):

    • जगत को मिथ्या असत् रूप बताया गया है। यह वास्तव में अस्तित्व में नहीं आया है, बल्कि संकल्प से दिखाई देता  है, और संकल्प के मिटने से जगत की कल्पना भी मिट जाती है

    • इसे असाररूप कहा गया है, जैसे देखने में विशाल लगने वाला बाँस भीतर से शून्य होता है या केले के वृक्ष में कोई सार नहीं होता।

    • वशिष्ठजी दृष्टांत देते हैं कि जैसे मरीचिका (मृगतृष्णा) में जल दिखाई देता  है, वैसे ही आत्मा में जगत दिखाई देता  है

    • जब आत्मज्ञान होता है, तो जगत अलग से नहीं दिखाई देता , ठीक वैसे ही जैसे जागने पर स्वप्न के पदार्थ नहीं भासते।

    • मुक्ति प्राप्त पुरुष (जीवनमुक्त) को सब कुछ ब्रह्मस्वरूप ही दिखाई देता  है

  • मन की भूमिका (Role of the Mind):

    • यह सारा जगत आडंबर मन ने ही रचा है, और सब कुछ मनरूप ही है

    • मन ही कर्मरूप है।

    • मन, परमात्मा से उत्पन्न हुआ है और उसने ही मोह (भ्रम) के कारण बंध और मोक्ष की कल्पना की है, तथा दृश्य प्रपंच (दृश्यमान संसार) को रचा है

    • सभी पदार्थ आत्मा में मन द्वारा कल्पित होते हैं।

    • मन को वृत्तिरूप कहा गया है, और यह चित्त की पाँच वृत्तियों (प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा-अभाव, स्मृति) का अभिमानी (प्रेरक) है।

  • चित्शक्ति (चेतना की शक्ति) और उसका स्पंदन (Pulsation of Consciousness):

    • जगत ब्रह्म में ही स्थित है, उससे इतर (अलग) कुछ नहीं है।

    • ब्रह्मसत्ता ही जगत रूप होकर भासती है

    • आदि चित्शक्ति जब स्पंद रूप (स्पंदनशील) होकर भासती है, तब वह जगत के आकार में प्रतीत होती है। जब यह स्पंदन शांत होता है, तब ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक जगत का अभाव हो जाता है।

    • शुद्ध चित्मात्र सत्ता जब 'अहं अस्मि' (मैं हूँ) के रूप में चेतन में स्फुरित होती है, तब उसे जीव कहते हैं। जब यह दृश्य (पदार्थों) की ओर स्फुरित होती है, तब जगत दृश्य होकर दिखाई देता  है और नाना प्रकार के कार्य-कारण प्रतीत होते हैं।

    • चित् से जो चैत्यमय वासना स्फुरित होती है, वह संसार के पदार्थों को उत्पन्न करती है।

  • संकल्प और वासना का प्रभाव (Influence of Sankalpa and Vasana):

    • जगत वासना (संस्कारों या प्रवृत्तियों) के कारण ही उदय हुआ प्रतीत होता है, यद्यपि वह वास्तव में उत्पन्न नहीं हुआ है।

    • जिसका जैसा संस्कार दृढ़ होता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है।

    • संकल्प ही अविद्या (अज्ञान) का मूल कारण है, और अविद्यारूपी जगत संकल्प से ही उत्पन्न होता है और संकल्प से ही नष्ट हो जाता है

चेतना ही सभी की स्रोत है

 "चेतना ही सभी की स्रोत है - ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; द्रष्टा, दर्शन और दृश्य; कर्ता, करण और कर्म" है, जो कि योग वशिष्ठ के केंद्रीय सिद्धांतों में से एक है। यह बताता है कि परम चेतना ही हर चीज़ का मूल है, जिसमें जानने वाला (ज्ञाता), ज्ञान और जो जाना जाता है (ज्ञेय); देखने वाला (द्रष्टा), देखना (दर्शन) और जो देखा जाता है (दृश्य); और करने वाला (कर्ता), क्रिया (करण) और कर्म (कार्य) शामिल हैं।


इस अवधारणा को विस्तार से समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है:


चेतना की प्रकृति (Nature of Consciousness):


स्रोत के अनुसार, ब्रह्म (जिसे परम चेतना भी कहा जाता है) एक सर्वव्यापी, अनादि, अनंत, अपरिवर्तनीय, निर्मल और परम सत्ता है। यह सर्वज्ञता का मूल स्रोत है और सभी तत्वों और चेतन-अचेतन प्राणियों का आधार है, जिसमें सभी चमकते हैं, मौजूद रहते हैं, और अंततः विलीन हो जाते हैं।


यह परम चेतना स्वयं में आनंद का सागर है और सभी प्राणियों का जीवन है।


यह विचार और समझ से परे है, परम शांति और सर्वव्यापी है।


यह ज्ञान का प्रकाश है और अपनी सहज शक्ति से स्वयं को अभिव्यक्त करती है। यह अविभाज्य है।


द्वैत का उदय (Emergence of Duality):


जो कुछ भी संसार में प्रकट होता है, वह परम चेतना में ही स्थित है। स्रोतों के अनुसार, यह ब्रह्मांड एक भ्रम (माया) है और इसका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है।


यह मन का ही एक रूप है।


"मैं" (अहंकार) और "यह" (जगत) की भ्रमित करने वाली अवधारणाओं के कारण ब्रह्मांड अस्तित्व में आता हुआ प्रतीत होता है, जबकि इसका वास्तव में सृजन नहीं हुआ है।


जब परम चेतना स्वयं को एक वस्तु के रूप में जानती है, तो इसे जीव (व्यक्तिगत आत्मा) के रूप में जाना जाता है। मन, जो अहंकार से जुड़ता है, मौलिक सिद्धांतों की धारणाएं उत्पन्न करता है, जिससे अनुभवजन्य दुनिया बनती है।


वास्तव में, अहंकार और गैर-अहंकार (देखने वाला और देखा गया) केवल कल्पना के राक्षसी रूप हैं। जब तक ये धारणाएं मौजूद रहती हैं, मुक्ति संभव नहीं है।


सृष्टि एक प्रतिबिंब या कल्पना के रूप में (Creation as a Reflection or Imagination):


संसार को चेतना का एक प्रतिबिंब (reflection) या छाया (shadow) कहा गया है। जैसे एक दर्पण वस्तुओं के प्रतिबिंबों को दर्शाता है, वैसे ही शुद्ध चेतना अपने भीतर सभी संसारों की छवियों को दर्शाती है।


यह जादुई दृश्य या स्वप्न में देखे गए शहर के समान है, जो जागने पर असत्य साबित होता है।


जैसे सोने से बने कंगन को तब तक सोना नहीं देखा जाता जब तक वह कंगन के रूप में देखा जाता है, वैसे ही जब संसार को वास्तविक मान लिया जाता है, तो आत्म-तत्व नहीं देखा जाता।


विचार और इच्छाएं ही संसार की वास्तविकता का अनुभव कराती हैं। मन ही संसार का निर्माता है और मन ही परम व्यक्ति है। जो मन द्वारा किया जाता है, वही कर्म है, शरीर द्वारा किया गया कर्म नहीं है।


मुक्ति का मार्ग (Path to Liberation):


जब विचारों का जाल समाप्त हो जाता है, तो अपनी स्वाभाविक अवस्था ही शेष रहती है।


सत्य का ज्ञान इस पूछताछ से प्राप्त होता है; ऐसे ज्ञान से स्वयं में शांति आती है; और फिर परम शांति उत्पन्न होती है।


इच्छाओं का त्याग मन को पिघला देता है और चेतना के मुख से अज्ञान के कोहरे को दूर कर देता है।


यह महसूस करना कि "यह सब अवास्तविक है, जिसमें मैं भी शामिल हूँ" दुःख से मुक्ति दिलाता है, या "यह सब वास्तविक है, जिसमें मैं भी शामिल हूँ" यह समझना भी दुःख से मुक्ति दिलाता है।


जब व्यक्तिगत अहंकार की भावना मन से मिट जाती है, तो स्वार्थ और स्वार्थी भावनाएं हृदय से स्वयं ही गायब हो जाती हैं, और मृत्यु और नरक के भय के साथ-साथ स्वर्ग और मुक्ति की इच्छाओं का भी अंत हो जाता है।


जो व्यक्ति स्वयं को ब्रह्म से भिन्न नहीं मानता, वह अहंकार के भ्रम को त्याग देता है और परम शांति प्राप्त करता है।

संक्षेप में, योग वशिष्ठ सिखाता है कि जो कुछ भी हम ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, कर्ता, करण और कर्म के रूप में अनुभव करते हैं, वह सब अकेली, अविभाज्य परम चेतना से ही उत्पन्न होता है। ये द्वैत केवल मन की कल्पनाएं और अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाले भ्रम हैं, और उनकी वास्तविक प्रकृति चेतना के समान ही है। इस मौलिक सत्य को पहचानना ही ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है।


मन को नियंत्रित करने के उपाय

 मन को नियंत्रित करना और आत्म-ज्ञान प्राप्त करना परस्पर जुड़े हुए हैं और इन दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए "योग वशिष्ठ महारामायण" में कई गहन तरीके बताए गए हैं।

मन की प्रकृति और उसे नियंत्रित करने के तरीके: स्रोतों के अनुसार, मन की प्रकृति अत्यंत सूक्ष्म है और यह भ्रम से उत्पन्न हुआ है। यह आकाश के समान अछूता और केवल एक नाम मात्र है, इसका वास्तव में कोई रूप नहीं है, और यह आत्मा से उत्पन्न नहीं हुआ है। मन ही सभी संकल्पों का कारण है, और यह इच्छाओं से पुष्ट होता है, जिसके कारण जन्म और मृत्यु जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। यह जड़ और चेतन के बीच की गाँठ है, जो दोनों अवस्थाओं में डोलता रहता है। मन को परम शत्रु कहा गया है जो दुःख का कारण बनता है।

मन को नियंत्रित करने के प्रमुख तरीके इस प्रकार हैं:

  • विचार (गहन चिंतन और आत्म-अन्वेषण): मन अविचार से सिद्ध होता है और विचार करने से नष्ट हो जाता है। यह मिथ्या ज्ञान को दूर करता है और मन के लिए औषधि के समान है। वशिष्ठजी कहते हैं कि मन को विवेक रूपी औषधि से शांत करना चाहिए।

  • सत्सँग (सज्जनों का संग): आत्म-ज्ञान प्राप्त करने और भ्रम को दूर करने के लिए सज्जनों का संग (सत्सँग) परम औषधि है।

  • सत्-शास्त्र विचार (श्रेष्ठ शास्त्रों का अध्ययन): सत्संग के साथ-साथ, आत्म-ज्ञान और भ्रम-निवारण के लिए सत्-शास्त्रों का विचार (चिंतन) अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • वैराग्य (विरक्ति/अनासक्ति): मन रूपी शत्रु को वैराग्य रूपी तलवार से मारना चाहिए। दृश्य (अनुभवजन्य संसार) से वैराग्य होने पर वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं और शांति प्राप्त होती है।

  • संकल्प त्याग (संकल्पों का त्याग): जब संकल्पों का त्याग किया जाता है, तो मन स्वतः ही नष्ट हो जाता है। मन में उठने वाली कल्पनाओं और संकल्पों का त्याग करें।

  • वासना क्षय (इच्छाओं का नाश): वासनाएँ ही बंधन का कारण हैं; वासनाओं से मुक्त होने पर कोई बंधन नहीं रहता। जब वासनाएँ शांत होती हैं, तो मन स्वतः ही निवृत्त हो जाता है। आत्म-विचार से ज्ञान होता है, जिससे दृश्य का अभाव होता है और वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं।

  • संतोष (संतुष्टि): संतोष मन को वश में करता है, जिससे नित्य, उदयरूप, निरीह, परम पावन, निर्मल, सम, अनंत और सभी विकारों से रहित आत्मपद प्राप्त होता है।

  • चित्त का उपशम (चित्त की शांति): चित्त का उपशम करना ही कल्याण का एकमात्र उपाय है। जब चित्त दृश्य को देखना बंद कर देता है, तब परम शांत ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है। जब चित्त अचल होता है, तो अविद्या (अज्ञान) नष्ट हो जाती है।

  • अभावनातत्त्व (भावों का अभाव करना): जगत को असत्य जानकर उसके प्रति अभावना का अभ्यास करें।

  • मन के निरीक्षक होना (मन का पर्यवेक्षक बनना): अपने मन के निरीक्षक बनें।

आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के तरीके: स्रोतों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आत्म-ज्ञान केवल ज्ञान से ही प्राप्त होता है, स्नान, दान या तप आदि बाहरी कर्मों से नहीं।

आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के प्रमुख तरीके इस प्रकार हैं:

  • ज्ञान (Knowledge): "श्री योगवाशिष्ठ महारामायण" को महाबोध (महान ज्ञान) का परम शास्त्र बताया गया है।

  • विचार (गहन चिंतन/अन्वेषण): यह आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का मुख्य कारण है और इससे संसार-भ्रम नष्ट होता है। यह विचार रूपी मति ही मिथ्या ज्ञान को शांत करती है। रात को विचारपूर्वक व्यतीत करना भी महत्वपूर्ण बताया गया है।

  • सत्सँग और सत्-शास्त्र विचार (सज्जनों का संग और श्रेष्ठ शास्त्रों का अध्ययन): ये आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण हैं।

  • पुरुषार्थ (आत्म-प्रयास): उस देव (परमात्मा) की प्राप्ति किसी तप से नहीं होती, केवल अपने पौरुष (पुरुषार्थ) और प्रयत्नों से ही होती है। जो व्यक्ति श्रद्धा सहित योगवाशिष्ठ को सुनता और नित्य विचार करता है, उसकी बुद्धि उदार होकर परमबोध को प्राप्त होती है।

  • श्रुत विचार (सुने हुए ज्ञान पर विचार): श्रुत विचार द्वारा अपने परम स्वभाव में स्थित होने पर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी उस पुरुष पर दया करते हैं और कहते हैं कि यह पुरुष परब्रह्म हो गया है।

  • दृढ़ अभ्यास (दृढ़ता से अभ्यास): सत्संगति और सत्-शास्त्र परायण होकर जब इनके अर्थ में दृढ़ अभ्यास किया जाता है, तो कुछ ही दिनों में परमपद की प्राप्ति होती है। आत्म-स्वरूप का दृढ़ अभ्यास करने से भ्रम शांत हो जाता है और आत्मा का साक्षात्कार होता है।

  • अहंभाव का त्याग (अहंकार/अस्मिता का त्याग): जब अहंभाव (जीवत्वभाव) नष्ट हो जाता है, तब जन्मों की संपदा नष्ट हो जाती है और केवल शुद्ध स्वरूप शेष रहता है। तब स्थावर-जंगम (स्थिर और गतिशील) संपूर्ण जगत आत्मरूप प्रतीत होता है।

  • दृश्य का अभाव (दृश्यमान संसार का अभाव): जब दृश्य का अत्यंत अभाव जाना जाता है और दृढ़ वैराग्य किया जाता है, तो आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है और भ्रम शांत हो जाता है। जब दृश्य का अभाव हो जाता है, तो द्रष्टा भी शांत हो जाता है।

  • चित्त का उपशम (चित्त की शांति): जब चित्त का उपशम होता है, तब नित्य, शांत ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है।

  • भावना (दृढ़ धारणा/संकल्प): चित्त संवित् में जैसा स्पंद दृढ़ होता है, वैसी ही सिद्धि होती है। जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसा ही वह पुरुष हो जाता है। जब चित्त में यह दृढ़ संकल्प होता है कि 'सब ब्रह्म है', तब मुक्ति होती है। बाहरी विषयों की भावना छोड़कर भीतर आत्मा की भावना करने से आत्मपद प्राप्त होता है।

  • ज्ञान की सात भूमिकाएँ: आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की सात भूमिकाएँ बताई गई हैं:

    1. शुभेच्छा: यह प्रारंभिक अवस्था है, जहाँ व्यक्ति संसार के प्रवाह को देखकर कल्याण की इच्छा करता है और सत्संग तथा शास्त्र विचार की ओर प्रवृत्त होता है।

    2. विचारणा: इसमें शास्त्र और सज्जनों के उपदेशों पर निरंतर विचार करना शामिल है, जिससे शुभ-अशुभ का ज्ञान होता है।

    3. इसके बाद की भूमिकाएँ व्यक्ति को धीरे-धीरे अज्ञान से मुक्त करती हैं। छठी भूमिका में भेद कल्पना का अभाव हो जाता है और व्यक्ति अपने स्वरूप में दृढ़ हो जाता है।

    4. सातवीं भूमिका को तुरीय कहते हैं, जो जीवनमुक्त की अवस्था है। जीवनमुक्त पुरुष सुख-दुःख में आसक्त नहीं होते और शांत भाव से अपने व्यवहारिक कर्म करते हैं। इसके परे तुरीयातीत पद होता है, जो विदेहमुक्त की अवस्था है।

संक्षेप में, मन को नियंत्रित करने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए मुख्य मार्ग विचार (आत्म-अन्वेषण), सत्संग, सत्-शास्त्र अध्ययन, वैराग्य, वासनाओं का क्षय और चित्त का उपशम हैं, जो अंततः आत्मा में दृढ़ स्थिति की ओर ले जाते हैं।


आत्मबोध (आत्मज्ञान या आत्मपद की प्राप्ति)

 आत्मबोध (आत्मज्ञान या आत्मपद की प्राप्ति)

योग वशिष्ठ के अनुसार, आत्मबोध (आत्मज्ञान या आत्मपद की प्राप्ति) का मूल कारण आत्मविचार है। यह केवल आत्मविचार से ही संभव है, न कि दान, तपस्या या वेद पढ़ने से।

आत्मबोध को समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है:

  • महा रामायण (योग वशिष्ठ) का महत्व: शास्त्रों में महा रामायण (योग वशिष्ठ) ही महाबोध का कारण है। इस शास्त्र के सुनने और विचारने से शीघ्र ही अज्ञान नष्ट होकर आत्मपद प्राप्त होता है। इसमें दिए गए इतिहासों को समझकर व्यक्ति जीवनमुक्त हो सकता है और उसे जगत् भासित नहीं होता, जैसे स्वप्न में जागे हुए को स्वप्न के पदार्थ भासित नहीं होते।

  • मन का नाश और अज्ञान की समाप्ति:

    • आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ही जन्मों का अंत होता है।

    • मिथ्या ज्ञान से उत्पन्न होने वाला जगत् विचाररूपी मति से शांत होता है

    • मन ही समस्त जगत् की रचना करता है और अपनी इच्छाशक्ति (संकल्प) से इसे उत्पन्न करता है। मन की उत्पत्ति शुद्ध चित्मात्र की स्पंदनात्मक शक्ति से होती है, जिसमें 'अहं अस्मि' का उद्भव होता है।

    • मन जड़ नहीं है और न ही चेतन; यह जड़ और चेतन के मध्य का भाव है, जिसमें संकल्प-विकल्प की कल्पना होती है।

    • यह मन भावनामात्र है (केवल विचारों का समूह)। मन का नाश होने पर परमात्मा ही शेष रहता है

    • मन विचार करने से नष्ट हो जाता है। जब मन लीन होता है, तब कर्म आदि भ्रम भी नष्ट हो जाते हैं।

    • अज्ञान ऐसी है कि वह असत्य को शीघ्र ही सत्य और सत्य को असत्य कर दिखाती है, और बड़ा भ्रम दिखाने वाली है।

    • अहंकार और अविद्या आत्मा के आभास मात्र हैं और इनका नाश विचार से होता है।

  • वासना और भ्रम का त्याग:

    • वासना ही जगत् के भ्रम का कारण है। जब वासना का त्याग किया जाता है, तब बंधन कोई नहीं रहता।

    • आत्मविचार से ज्ञान होता है, और ज्ञान से दृश्य (जगत्) का अत्यंताभाव होता है।

    • जब दृश्य का अत्यंताभाव होता है, तब सब वासना नष्ट हो जाती हैं

    • जब मन शांत होता है और वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, तो जगत् का भ्रम भी समाप्त हो जाता है

  • अभ्यास और वैराग्य:

    • आत्मपद की प्राप्ति के लिए विचाररूप अभ्यास करना चाहिए।

    • सत्सँगति और सत् शास्त्र का दृढ़ अभ्यास करने से परमपद की प्राप्ति होती है।

    • जब दृश्य (जगत्) से दृढ़ वैराग्य होता है, तब वासना क्षय हो जाती है और शांति प्राप्त होती है।

    • आत्मसत्ता का अभ्यास करने से जगत् भ्रम शांत हो जाता है।

    • जब ब्रह्म सत्ता की ओर तीव्र अभ्यास होता है, तब परमपद की अवश्य प्राप्ति होती है।

  • ज्ञान की भूमिकाएँ (दशाएँ):

    • योग वशिष्ठ में ज्ञान की सात भूमिकाएँ बताई गई हैं।

    • ज्ञान वह है जहाँ शुद्ध चित्मात्र में चैत्यदृश्य के फुरने से रहित होकर स्थिति होती है

    • अज्ञान की दशा वह है जहाँ शुद्ध चित्मात्र अद्वैत में 'अहं' संवेदना उठती है और व्यक्ति स्वयं को स्वरूप से भिन्न गिनता है।

    • जो ज्ञानी होते हैं, उनकी निष्ठा सत्य स्वरूप में होती है, वे चलायमान नहीं होते और राग-द्वेष नहीं रखते।

    • जब छहों भूमिकाएं एकता को प्राप्त होती हैं, तो उसे तुरीय अवस्था कहते हैं, जो जीवनमुक्त की अवस्था है।

    • जब चित्त उपशम होता है, तब जगत् का भ्रम मिट जाता है

संक्षेप में, आत्मबोध का मार्ग आत्मविचार, मन की वृत्तियों (संकल्प-विकल्प) का निरोध, वासनाओं का त्याग, और सत्यस्वरूप ब्रह्म के दृढ़ अभ्यास से प्रशस्त होता है, जिससे अज्ञान का नाश होता है और व्यक्ति जगत् के भ्रम से मुक्त होकर आत्मपद को प्राप्त होता है।